अर्थव्यवस्था और व्यापार-उद्योग मंदी मे हो और
दुनिया चौतरफा वित्तीय संकट से जूझ रही हो तो मीडिया उद्योग भी इससे अछूता नहीं रह
सकता। उसका उद्योग भी प्राभावित होगा। विज्ञापन आखिरकार बूम-बूम करती अर्थव्यवस्था
से ही निकलते हैं। गत दो दशक में यह उद्योग भी अन्य उद्योगों के समान खूब फला-फूला
है। मीडिया घरानों के मुनाफे में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। जो अखबार बंद
होने के कगार पर थे वे फिर से सरपट दौड़ने लगे। जो औंधे मुँह पड़े थे वे फिर से
खड़े हो गये। विजुअल मीडिया की एक लम्बी कतार का जन्म हुआ तो वहीं डिजिटल मीडिया
और पीआर (पब्लिक रिलेशन) घराने बरसाती मेढ़क की तरह फैल गये।
मीडिया घरानों की तादात् बढ़ी तो कर्मिकों के मांग में भी वृद्धी आयी। कर्मियों के कमायी में भी इजाफा हुआ। नये-नये हुनर व्यवसायिक विद्यालयों से प्रशिक्षित हो कर ‘वी प्रोफेशनल’ एजेंडे के साथ आने लगे। मीडिया व्यवसाय के नये-नये तरकीब को जन्म देने लगे। ‘एक्टिविज्म‘ के जिस मूल अवधारणा से ‘जर्नालिज्म’ का जन्म हुआ था उसे तुच्छ समझा जाने लगा। नये प्रशिक्षुओं को समझाया जाने लगा, ‘तुम यह तय करो कि जर्नालिस्ट हो या एक्टिविस्ट? अगर जर्नालिस्ट हो तो वह करो जो शेठ कह रहा है और यदि एक्टिविस्ट हो तो जर्नालिज्म छोड़ दो।‘ मीडिया उद्योग के दिन दूना, रात चौगुना बढ़ते मुनाफे ने नये निवेशकों को खूब आकर्षित किया। इस कारण भारी तादात् में ऐसे लोग आने शुरू हुए जिनका प्रभाव मीडिया के लिये स्वास्थ्यवर्धक नहीं। कई अखबार और टीवी समाचार चैनल पर जान-बूझकर खबरों और विज्ञापनों का भेद मिटा दिया गया। जिससे बाजार की तो सेवा हुई लेकिन पाठक-दर्शकों की निष्ठा-भरोसे में जबरदस्त गिरावट आयी।
मीडिया उद्योग का बढ़ना उसके सकारात्मक प्रभाव का बढ़ने का पैमाना नहीं है। सामान्यता देखा जा सकता है कि मीडिया को पत्रकारिता से परे मनोरंजन के रूप में परोसा जा रहा है। विश्वासनियता और लाभदायिता के चुनाव में मीडिया के एक बड़े वर्ग ने लाभदायिता को प्रधानता प्रदान की है। प्रभाव की जगह पहुँच को प्रधानता प्रदान है। गृहों का आकलन उनके खबरों के प्रभाव से नहीं रीडरशिप, कवरेज एवं टीआरपी से तय हो रहे हैं। पत्रकारिता में लोकहित एवं जन-जागृति का क्षय हुआ है वहीं पीआर एजेंसी के ईशारे और पाठक-दर्शक बढ़ाऊँ सामाग्री छाप मारने-दिखाने का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। संपादक की भूमिका एवं पूछ गौण हुई है वहीं प्रबंधन-प्रबंधक मालिक हो गये हैं।
मीडिया के व्यापारवाद का यह अनिवार्य परिणाम है। वैसे
इस परिस्थिति से ज्यदा किसी को ऐतराज नहीं हुआ लेकिन जिन कुछेक जो जागरूक और
भविष्य से परिचितों को इससे ऐतराज हुआ तो उन्हें प्रबंधन ने किनारे लगा दिया बाकि
पेट-परिवार के मारे खुद-ब-खुद मुँह, आँख-कान को बंद कर लिये। उद्योग-व्यापार,
प्रशासन पर निगेहबानी-चौकीदारी की भूमिका कम हो गयी। कई क्षेत्रों में तो मीडिया
उद्योग-व्यापार का सहायक-भागीदार हो गया। ठेर-ठिकाने तो उसने बकायदा मुनाफे में
हिस्सेदारी की माँग की। इसमें कुछ गलत भी नहीं। क्योंकि जब आप पत्रकारिता नहीं कर
रहे तो आप के तटस्थ पर्यवेक्षक बने रहने का कोई तुक नहीं है। मीडिया के व्यापार
में आप मुनाफे कमाने आये हैं तो लाभ आपका अधिकार है जैसे अन्य व्यवसायिक प्रतिष्ठान
में प्राप्त होते हैं।
किंतु मीडिया के साथ एक समस्या है, यह उद्योग तो
है लेकिन विशुध्द रूप से उद्योग-व्यापार नहीं है। मीडिया परफ्युम अथवा गोरे होने
के लिये क्रीम बनाने की फैक्टरी नही है जो अपने उत्पाद के द्वारा जन-जीवन जरूरत की
सेवा एवं कर भुगतान द्वारा देश सेवा का दायित्व निर्वाहन कर रहा। मीडिया की तरह
अपने कार्य के जरिये वे उत्पादक समाजहित एवं जन-जागृति, देश के लिये लोकमत निर्माण
का कर्तव्य निर्वाह नही करते। मीडिया गृह भले ही खबरों और मतों को बेंचकर चलें
लेकिन वे अपने दायित्व से नहीं भाग सकते। वे निर्मूल्य अथवा महज विक्रेता हो कर
नहीं रह सकते। उन्हें अपने दायित्व को स्वीकार करना होगा। अपने उत्पाद की
जिम्मेदारी हर उत्पादक और विक्रेता लेता है। यदि वह ईमानदारी पूर्वक व्यवसाय करता
है, यदि वह व्यवसाय ही करता है और यदि उसे दीर्घ-अवधि का व्यवसाय करना है । तो फिर
मीडिया भी यदि व्यवसाय ही करता है तो कैसे विशुध्द व्यवसायिक सिधांत से भाग सकता
है?
मीडिया की जिम्मेदारी अपने उत्पाद क्षेत्र से आगे
तक जाती है क्योंकि वह प्रभाव के कार्य में है। इस कारण उसे किसी अन्य उत्पादक की
तुलना में नीर-क्षीर विवेक की उपयोगिता अत्यंतावश्यक है और यह न्यायपरकता,
न्यायशीलता, न्यायप्रियता और तटस्थता के उपस्थिती में ही संभव है। आज सबकुछ जहाँ
पूँजी आधारित है वहाँ मीडिया के अर्थिक हितों को जड़मूल से नकारना निरा मूर्खता
है। मीडिया के अर्थिक हितों को जो परे से नकारे समझ लेना चहिए कि उसे
पाठकों-दर्शकों के निर्दयिता, उसके स्वार्थी स्वभाव के बारे में कुछ भी नहीं
मालुम। उसे उस पाठक के बारे में कुछ भी नहीं मालुम जो मूल लागत का दस-बीस प्रतिशत
दे कर अखबार लेता है और फिर आधे किलो बासमती चावल या फिर एक जोड़े काँच गिलास सेट के
लकी ड्रा में भाग लेने के लिये अपने अखबार को बदल, अगले माह के लिये लकी ड्रा वाला
अखबार बँधवा लेता है। लेकिन सब के बावजूद अपनी स्वतंत्रता एवं तटस्थता की रक्षा के
लिये मीडिया को यह सोचना होगा कि किससे क्या ले और किससे क्या ना ले। किसी से यदि
कुछ ले तो किन शर्तों एवं सिधांतों पर ले। उसका लेन-देन विशुद्ध वाणिज्यिक नहीं हो
सकता। क्योंकि विशुद्ध वाणिज्यिक लेन-देन वैचारिक प्रभाव डालेगा और मीडिया की
सत्ता-प्रतिष्ठा का क्षरण होगा।
वैश्विक स्तर पर अर्थिक चड़ाव-उतार एक कठोर सत्य
है। जगव्यापी अर्थिक संकट कभी भी आ जाते हैं और तब उस मंदी का असर मीडिया पर भी
होता है। वह भी मुश्किल में पड़ता है। लेकिन इससे मुक्ति या राहत वह अपनी
स्वतंत्रता एवं तटस्थता की कीमत पर लेना उचित है? भारत की मीडिया को राज्य अपनी
शक्ति से उसे अपनी तरफ करने को हमेशा प्रयासरत रहा है और मीडिया हमेशा जरूरी कीमत
चुकाता रहा है। मीडिया को राज्य शक्ति के तले लाने की कोशिश का यह खेल आपातकाल के
पहले जहाँ ढ़क-छुपाकर होता था आपातकाल से यह खेल सरेआम हुआ। इंदिरा गाँधी ने जेल से
डराया तो अटल जी ने रेड से, राजीव गाँधी ने मित्रता और महाफिलों से अपनी तरफ करने
की कोशिश की। किसी ने फ्लैट-प्लाट आवंटन का सहारा लिया तो कोई प्रस्तावित फाइल को
पास कर के अपनी तरफ खींच रहा है। कुल-मिलाकर निष्कर्ष बस इतना है कि प्रत्येक
राज्य शक्ति उसे अपनी तरफ करने में है।
मीडिया का आग्रह है कि राज्य को उसके काम में दखल
नहीं देना चाहिए लेकिन अपने संकठ काल में वह राज्य को मदद को पुकारेगा तो क्या मदद
करने वाला राज्य उसका भोग करने से चूकेगा? राज्य तो हमेशा दुःशासन की तरह प्रेस की
चीरहरण के फीराक में होता है और जब द्रोपदी खुद साड़ी के बिना राज्य दरबार मे
पहुँच जायेगी तो इज्जत को छोड़ेगा यह सोचना भी निरा मुर्खता है।
नवउदार पूँजीवाद को लेकर संवेदनशील अपनी मीडिया
सरकार द्वारा मुफ्त में बाँटे जा रहे विभिन्न उपहारों का विरोध कयों नहीं करती?
विपक्ष के शून्यता पर अलोचना-समलोचना की जिम्मेदारी मीडिया पर होती है, मीडिया उस
दायित्व से क्यों कट रही है? करदाताओं के पैसे लोकलुभावने योजना, लक्जरियस प्रवास,
हर तीसरे दिन एक मनोरंजक स्टेज शो, अरबों में हो रहे पीआर पर सरकार धड़ल्ले से
फूँकती है और मीडिया सब पर चुप है। क्या मीडिया को दलील नहीं देनी चहिए कि राज्य
का पैसे अनुत्पादक संसाधनों में व्यय हो रहा है जबकि भारत जैसे देश मे अभी उत्पादक
संसाधनों में ही निवेश की जरूरत है। जिससे एक नये पूँजी का श्रोत हो। लेकिन मीडिया
चुप है। वजह साफ है, मीडिया की अपनी काली सच्चाई! जिसे वह उजागर नहीं होने देना
चाहती।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय यह अच्छी तरह जानता
है कि टीआरपी और सरक्युलेशन में कितना झूठ है। वह किस फरेब के ढ़ाचे पर खड़ा है।
टेलीवीजन वाले प्रत्येक दस हजार घर पर, लगभग एक घर में व्युरशिप मापने के यंत्र
लगे हैं और उनसे भी मिली जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। इसी से कार्यक्रम की
गुणवत्ता एवं विज्ञापन आदिक तय होते हैं। फिर इसे छुपाना, सरकार द्वारा मीडिया के
लिये जनता से फरेब नहीं है? इसे सरकार यूहीं नहीं छुपाती, वह इस बहाने मीडिया का
पीठ खुजलाती है और बदले में मीडिया सरकार का पीठ खुजलाती है।
मुंबई हमले को कवर करने के बाद सरकार ने केबल
टेलीविजन नेटवर्क्स के लिये नौ दमनकारी संसोधन नियम प्रस्तुत किये। लेकिन जैसे
हो-हल्ला मचा संसोधित नियम वापस खींच लिये गये। अब सीधी-सी बात है कि यदि संसोधन
जनहित में जरूरी थे तो पारित क्यों नहीं किये गये? अथवा वे सिर्फ मीडिया पर दबाव
बनाने के लिये प्रस्तुत कर दिये थे? और यदि ऐसा नही है तो मीडिया लाख हो-हल्ला
मचाने पर भी पारित करना था। आखिरकार सरकार मीडिया नहीं, जनसेवा करने के लिये है।
लेकिन कोई भी सरकार ऐसा नही करती, वह बस मीडिया को डरा-दबाकर रखना चाहती है।
प्रत्येक सरकार का मंशा उसे जिंदा रखते हुए बस उससे खेलने का होता है। सरकार
मीडिया को गलती करने का अवसर सुलभ कराती है। जिससे उसकी गर्दन सरकार के हाथ में
रहे और वह डरी-सहमी सरकारी के ईशारों पर नाचती रहे। क्या मीडिया को राहत देने,
बार-बार तमाम गृहों को राहत देने के पीछे सरकार की मंशा कुछ और हो सकती है? मीडिया
को सोच लेना चहिए।