Saturday, 30 November 2013

व्यक्ति बनाम व्यक्तित्व


व्यक्ति और व्यक्तित्व दो ऐसे पहलू हैं जिनके मध्य हमेशा संघर्ष देखने को मिलता है। व्यक्ति जहाँ निजी जिंदगी का घोतक है,  वहीँ व्यक्तित्व व्यवहारु जिंदगी का! व्यक्ति हमेशा दोहरी जिंदगी जीता है. एक जिंदगी में उसका व्यवहार खुद तक सिमित होता है तो दूसरे उसका समाजीकरण होता है। यह बात हर किसी पर लागू होती है, चाहे वह कार्ल मार्क्स, अल्बर्ट आइंस्टाइन, तरुण जीत तेजपाल हों या फिर कोई और! हम सबको यह बात समझनी होगी अन्यथा हम अपने प्रतिभावों को खोते जायेंगे.

21 नवंबर से पहले तक तहलका के पूर्व एडिटर इन चीफ तरुण तेजपाल पत्रकारिता की दुनिया का एक ऐसा नाम था जिसके सामने अच्छे-अच्छे बिरले पानी भरा करते थे। 30 साल लंबे करियर में तेजपाल ने कई ऐसी खबरें की हैं जिन्होंने ने समूचे सिस्टम को झकझोर दिया था खोजी पत्रकारिता की दुनिया में तेजपाल के खुलासे से सरकारें हिल गईं। लेकिन आज तेजपाल खुद एक शर्मनाक तहलका बन गए हैं।

तरुण तेजपाल, वह व्यक्तित्व है जो खोजी पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 13 साल से तहलका मचा रहा है। कई सफेदफोश चेहरों को बेनकाब किया। बेईमान नेता हों या रिश्वतखोर अफसर, सबकी रीढ़ की हड्डी कंपाने वाला ये इंसान अब खुद कठघरे में आ खड़ा हुआ है। तरुण तेजपाल ने खोजी पत्रकारिता की दुनिया में ऐसी लकीर खींची है जिसे छोटा कर पाना आसान नहीं। उसे मिटा पाना भी आसान नहीं। भले ही व्यक्तिगत जीवन में ये आरोप किसी कलंक से कम नहीं लेकिन पत्रकारिता में उनके नाम पर ऐसा कोई कलंक कभी नहीं लगा।

पिछले दिनों से यह देखने को मिल रहा है कि तेजपाल का सहारा लेकर तहलका, तहलका के सदस्य और सम्पूर्ण पत्रकारिता जगत पर निरंतर हमले हो रहे हैं. जितनों के हाथ संपादक-पत्रकारों ने जला रखे थे वे सब तेजपाल के नाम पर मरहम लगा रहे है। जो भी मन पड़े बके जा रहे हैं।

अब इन्हें कौन समझाये कि जो काम तहलका ने गत वर्षों में किया है वह सिर्फ तेजपाल का काम नहीं था। बहुत से लोगों के परिश्रम ने तहलका को सवांरा था। और मान लें, तेजपाल ने ही किया था तो भी उनके पत्रकारिता पर उंगली उठाने का किसी को कोई हक़ नहीं है। क्योंकि अपने पत्रकरिता के दौरान उन्होंने अपनी पत्रकारिता के भूमिका को बखूबी अदा किया। वे अपने निजी जिंदगी में क्या करते हैं वह अलग मुद्दा है। कुछ लोग कह सकते हैं कि उन्होंने अपने अधीन कार्य करने वाली महिला के साथ किया तो यह मुद्दा निजी न रह गया परन्तु वे यदि यदि ऐसा कुछ कहते हैं तो भी गलत है। क्योंकि शारीरिक आकर्षण एक तरुण तेजपाल नामक व्यक्ति को हो सकता है तहलका संपादक तरुण तेजपाल नामक व्यक्तित्व को नहीं।

एक संपादक कि जिंदगी खबर ही होती है और यदि वह खबर के साथ खिलवाड़ करे तो उसके पत्रकारत्व पर, व्यक्तित्व पर उंगली उठानी चाहिए ना कि किसी निजी व्यव्हार के कारण। तेजपाल ने हमेशा खबरी दुनिया को निखारा है इसलिए तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता ना ही, तहलका और पत्रकारिता जगत को। तरुण तेजपाल नामक व्यक्ति के साथ वही सुलूक होना चाहिए जो कानून की नज़रों में उचित हो लेकिन तरुण तेजपाल नामक संपादक को क्षति नहीं पहुँचनी चाहिए। ना ही पत्र, पत्रकारिता और किसी संपादक पर, किसी को उंगली उठाने का हक़ है।

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