ईरान के साथ अमेरिका एवं अन्य पाँच शक्तियों के साथ हुए समझौते ने फिर बार साबित कर दिया कि अमेरिका ही खिलाडी है बाकि सब उसके बिसात पर बिछे मोहरे! इस समझौते ने फिर एक बार भारत के कूटनीति और दीर्घदर्शीय सोच पर सवालिया निशान लगा दिया है। अगर मौका रहते भारत ने इस मौके को पहचाना होता तो शायद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अपनी नींव रखने में कामयाब हो जाता लेकिन जिस तरह से भारत ने अमेरिकी मार्गदर्शन का पालन किया उससे सिर्फ उसकी हैसियत फिर एक बार पिछलग्गू तक ही सीमित होकर रह गई। इस वक्त के बदलते वैश्विक परिदृश्य को देखा जाये तो महाशक्तियाँ नहीं वरन ईरान, इजराइल, सीरिया जैसे देश ही वैश्विक राजनीति-व्यापारनीति का समीकरण रच रही हैं और भारत लगातार इस नीति को समझने में थाप खा रहा है।
सीरिया के मुद्दे में तटस्थता और ईरान के मुद्दे में अमेरिकीय समर्थित व्यवहार ने इसे केंद्र से परे धकेल दिया वरन शायद ‘रुख अख्तियार’ का जिम्मा ईरान नहीं, भारत निभाता। इसमे कोई शक नहीं है भारत को फायदा अब भी होगा! इस समझौते से भारत को चहुँमुखी फायदा होगा, लेकिन वह तेहरान के प्रसादपर्यन्त होगा।
भारत को अब ईरानी रिश्ते को लेकर जरुरत से ज्यादा सजग हो जाना चाहिए क्योंकि अब की गयी गलती शायद अनिश्चित काल भारत को फिर मौका ना देगा। हालाँकि ईरान के उप-विदेश मंत्री की भारत यात्रा को एक शुभ संकेत समझा जा सकता लेकिन मौके को गम्भीरता से लेना होगा। अगर भारत ने मौके के नज़ाकत को भाँपकर ज़रा भी प्रतिबद्धता वर्ती तो भारत के लिए ईरान से सम्बन्ध स्थापित करने में सुगमता होगी। ईरान के बाद भारत ही ऐसा देश है जहाँ सर्वाधिक शिया मुस्लिम निवास करते हैं। सांस्कृतिक जुड़ाव भी इसकी अहम् वजह बन सकती है क्यों ना, भारत सरकार ने पूर्व में इसी सांस्कृतिक जुड़ाव के ईरानी गुहार को अनदेखा कर दिया था। लेकिन इसके उपयोग से रिश्ते में मधुरता कि प्रबल सम्भावना है।
पाकिस्तान भी रूकावट के जगह भारत-ईरान सम्बन्ध को ईरान-पाकिस्तान-भारत परियोजना के कारण सुगमता प्रदान करेगा। पाकिस्तान जानता है, जब तक भारत इससे नहीं जुड़ता तब तक गैस सस्ती नहीं पड़ेगी। वहीं ईरान को भी पता है भारत के बिना यह परियोजना टिकाऊ नहीं होगी। भारत का जुड़ना सबके हित में है। लेकिन भारत ने जैसा किया है, उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। भारत को अब सामने से जाना पड़ेगा और कहना होगा, "वह इसमें शामिल होना चाहता है क्योंकि पश्चिमी देशों ने आपसे प्रतिबंध हटा लिए हैं।" अपने पूर्व कर्मों के कारण अब बेशर्मी तो करनी ही होगी।
व्यापारिक सम्बन्ध भारत-ईरान के रिश्ते की नींव रखने में अहम् भूमिका अदा करेंगे। भारत सरकार ने तो अपनी तेल कंपनियों पर इस बात के लिए ज़ोर डाला था कि वो वहां पर अपना काम बंद करें। यह तो कंपनियों की समझदारी थी कि उन्होंने अपने प्रोजेक्ट बंद नहीं किए. उनको सक्रिय रखा, जिससे आज वे वापस जा सकती हैं। और भारत को भी सम्बन्ध में सुधारने में एक आसानी होगी।
ईरान से हमारे रिश्ते बेहतर हुए, तो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारतीय पहुंच आसान होगी, आगामी वर्ष काबुल से अमेरिकी फौज अपनी वापसी के लिए तैयार है ऐसे हालत में यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। अब चूक भरी नुकसान करेगा।
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