पिछले सप्ताह मैंने उत्तर प्रदेश का
यात्रा किया। जहाँ के मतदान शायद भारतीय राजनीति में सबसे अहम् भूमिका अदा करने के
साथ, भारत की दशा-दिशा तय करते हैं। लेकिन यह देख ताज्जुब के साथ क्रोध भी
आया कि वहाँ मुद्दे नहीं लहर है। वहाँ के, जरुरत के मुद्दे के ऐसा नहीं कि सिर्फ
वही के लिए हो,
वरन वे देश के लिए भी जरुरी हैं लेकिन अफ़सोस उन मुद्दों पर नेता, पत्र-पत्रकार,
स्व-कथित
सामाजिक ठेकेदार, यहाँ तक कि मतदाता भी ध्यान नहीं देना चाहते।
कृषि सुधार उत्तर प्रदेश का सबसे अहम् मुद्दा और जरुरत है लेकिन
हर कोई इस मुद्दे पर चुप्पी साधते नजर आ रहा है। यह सबसे दयनीय स्थित है कि जहाँ
के पैदावार से तीन और देश का पेट भर जाये वहाँ के किसान खुद रो रहे हैं और इनके
पीछे कोई माँ-बाप नहीं हैं। उत्तर-पश्चिमी
किसानों के हालत तो फिर भी ठीक हैं लेकिन पूर्वी के किसानों के हालत बाद से बदतर
है। इस क्षेत्र के सबसे अहम् नगदी फसल के रूप में गन्ने को माना जाता है लेकिन
सबसे बुरे हालत गन्ना उत्पादक किसानों के ही हैं। महीनों चले नूरा-कुश्ती के बाद
अंततः चीनी मिल मालिकों ने मिल शुरू तो किया लेकिन उससे किसान नहीं सिर्फ सरकार को
वोट-चंदे और मिल मालिकों को फायदा होने वाला है।
अखिलेश यादव सरकार ने चीनी मिलों के
लिए अपना पिटारा खोल दिया। सरकार चीनी पर प्रवेश कर और गन्ना क्रय की छूट पहले ही
दे चुकी है। चालू सत्र में गन्ना समितियों के कमीशन की भरपाई प्रदेश सरकार करेगी। इससे
चीनी मिलों को करीब पाँच सौ करोड़ रुपये लाभ मिलेगा। प्रवेश कर में छूट से दो सौ
उन्नीस करोड़ की राहत, तो
गन्ना क्रय कर में एक सौ साठ करोड़ रुपये की रियायत दी गई है। शीरा बिक्री पर
नियंत्रण हटाने से चीनी उद्योग को एक सौ सड़सठ करोड़ का लाभ होगा यानी एक हजार
छयालीस करोड़ रुपये की रियायत चालू सीजन में शुगर इंडस्ट्री को दी गई हैं। मिलें
गन्ना मूल्य दो सौ अस्सी रुपये प्रति क्विंटल अदा करने पर राजी हैं, लेकिन इसका भुगतान दो किस्तों में किया
जाएगा। मिलें किसानों को दो सौ साठ रुपए तुरंत गन्ना लेते वक्त करेंगी और शेष बीस
रुपए पेराई सत्र के पूरा होने से पहले दे दिए जाएंगे।
अब यहाँ ध्यान देने लायक यह बात है कि
दो सौ अस्सी रुपये तो गत वर्ष भी गन्ने का मूल्य था तो फिर इसमे किसानों को क्या
मिल रहा है? हर
जगह मंहगाई मार पड़ रही है तो क्या किसान सबकुछ सस्ते में खरीद रहा है, उसके लागत में कोई इजाफा नहीं हो रहा
है। किसानों
के जरुरत से सम्बंधित सारी वस्तु,
चाहे उनके घर की हों या फिर खेती की सब यथास्थित हैं. जैविक, पानी, बीज, मेहनत-मजदूरी
सब जस के तस हैं. कहीं कोई इजाफा नहीं है? और यदि है तो उन्हें इजाफा क्यों नहीं
दिया जाता।
लेकिन कोई इसके खिलाफ नहीं बोल रहा है
बल्कि सब मिल शुरू हो गई इसी बात का जश्न मनाये जा रहे हैं। क्योंकि किसान सिर्फ
किसान है। उसका कोई जाति-धर्म मज़हब नहीं है। वह खुद खाने को तरस रहा है फिर किसी
को चंदा क्या देगा,
फिर क्यों कोई उसकी आवाज़ को बुलंद करे। कुछ जो स्व-कथित किसान समर्थक उपज भी आये है वे किसान पैरोकार कम
शासन के दलाल ज्यादा हैं। जो इसी ताक में होते हैं कि थोड़ा हो-हल्ला मचा कर
रखो ताकि वक्त पर किसान वोट का थोक में सौदा किया जा सके।
लगभग एक महीने देर से शुरू हुई मिलों
ने गेहूँ के आगामी फसल को पूरी तरह निगल लिया है। खेतों से गन्ना खाली न होने के
कारण अभी तक गेहूं की पाँच फीसदी भी बुआई नहीं हो सकी है, जबकि दस दिसंबर
तक गेहूं की सौ फीसदी बुआई की जानी थी। इस बार गेहूं के क्षेत्रफल के साथ प्रति
हेक्टेयर पाँच क्विंटल उत्पादन बढ़ाने की योजना भी कृषि विभाग ने बना रखी थी,
लेकिन
ये सभी धरी की धरी रह गई हैं। कृषि विभाग की योजना पर चीनी मिलों ने पानी फेर दिया
है। पानी भी ऐसा कि अधिक उत्पादन की बात तो दूर, अबकी गेहूं के
दाने-दाने को लोग तरसते नजर आएंगे। ऐसे में अब किसान यदि गन्ने से थोड़ा-बहुत प्राप्त भी करते वह गेहूँ
के खरीद में गवाँ देना है। किसान नंगा का नंगा ही रहेगा और अखिलेश सरकार के
योजनाओं का फायदा सिर्फ मिल मालिकों और सत्ता के दलालों को ही होगा।
कोई मंदिर कि लहर बना रहा है तो कोई
मस्ज़िद की! कोई आरक्षण को तूल दे रहा है तो कोई जातिवाद को! हर कोई एक समाज विशेष
के पीछे पड़ा है। ऐसा लग रहा है कि समस्त राजनैतिक दलों ने कोई गुप्त समझौता कर रखा
है कि तुम हिन्दू को ले लो, मै मुस्लिम को, तुम दलित को ले
लो, मै सवर्ण को! ब्राह्मण-बनिया, क्षत्रिय-पठान
इत्यादि पर समस्त पार्टियों का,'बाँटों और राज करो' का
नजरिया कायम है। भारत के हर कोने से जाकर अयोध्या में मंदिर-मस्ज़िद-शौचालय इत्यादि
बनाने को सब बेक़रार हैं लेकिन वहाँ के फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, बहराइच इत्यादि जिले में जूझ रहे किसानों की किसी को
नहीं पड़ी। यहाँ
कि लचर
स्वस्थ-शिक्षा व्यवस्था, मार्ग-परिवाहन, उद्योग विहीनता, हजारों की तादात में मजदूरी के लिए घर
छोड़ते लोग इत्यादि मुद्दे नहीं हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समुचित समुदाय को
समर्पित मुद्दे चुनावी परिपेक्ष्य से लगभग नदारद हैं और उनके जगह समस्त राजनैतिक
दल सिर्फ मासूम किसानों को ठगने के लिए बेबुनियादी लहर का ताना-बाना बुन रहे हैं।
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