Wednesday, 17 August 2016

डॉ. निर्मला के मंत्रित्व की चुनौती उनका पडोसी है












राज्य के नए मुख्यमंत्री विजय रूपानी के मंत्रिमंडल में इकलौती महिला मंत्री डॉ. निर्मला बेन सुनील वाघवाणी को शामिल किया गया है. डॉ. को राज्य कक्षा के मंत्री का दर्ज प्राप्त हुआ है. उन्हें महिला एवम बाल विकास का मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है. डॉ. निर्मला पेशे से गायनेक डॉक्टर हैं. राजस्थान यूनिवर्सिटी से एमएस डॉ. निर्मला, डाक्टरी के पेशे में सामान्य रही है. यह दिलचस्प है कि डॉ. को जिस मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है उसका वीभत्स चेहरा उनके घर के बगल से ही शुरू होता है. तो क्या अपने मंत्रिमंडल के चुनौती से वे निपट पाएंगी(?) यह एक बड़ा प्रश्न है.

डॉ. निर्मला जिस विस्तार से आती है उसे अहमदाबाद शहर के पिछड़े विस्तार में एक माना जाता है. महिला हों या बच्चे! दोनों के हालत बदतर हालात में हैं. कुपोषण, अशिक्षा, बाल मजदूरी, घरेलू हिंसा वहां के हर गली-मोहल्ले में आम है. ऐसी स्थिति में डॉ. को यदि सच में अपने मंत्रालय महिला एवम बाल विकास के दायित्व को जिम्मेदारी पूर्वक निभाना होगा तो उसकी शुरुवात देवी ज्योत अपार्टमेंट कुबेरनगर में स्थित उनके अस्पताल के नीचे से ही शुरू करनी पड़ेगी.

पूरे राज्य की बात तो बाद की है पहले डॉ. निर्मला को नरोडा में ही महिला एवम बाल विकास करना होगा. अगर आगामी चुनाव से पहले वे सिर्फ नरोडा में महिलाओं और बालको की स्थिति सुधर ले जाती है तो शायद रूपानी साहब के निर्णय को सही साबित कर देंगी. वैसे उनको चर्चा में मुख्यमंत्री नहीं बल्कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह द्वारा बनाया मंत्री माना जाता है लेकिन फिर भी, मंत्री तो वे रूपानी साहब के मंत्रिमंडल की  ही हैं

डॉ. निर्मला नरोडा विधानसभा से बीजेपी के सीट से विधायक है. नरोडा की पूर्व विधायक माया कोडनानी के पतन के साथ डॉ. का राजनितिक उदय हुआ लेकिन विगत वर्षों में वह सरकार के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण किनारे रही. उन्हें कभी लाइमलाइट में आने का मौका नहीं मिल सका. डॉ. को बीजेपी के अमित शाह सिंडिकेट का भरोसेपात्र बताया है.  अंदरखाने चल रहे गपशप के अनुसार आनंदीबेन के मंत्रिमंडल में जो जगह वसुबेन त्रिवेदी का था उसी जगह पर अब डॉ. निर्मला स्थापित किया जा रहा है.  


वसुबेन की जगह पर डॉ. निर्मला को  स्थापित करने की राह आसान नहीं है क्योंकि उनके अस्पताल के नीचे वाले लोगों को भी उनपर भरोसा नहीं है. उनके अनुसार डाक्टरी के पेशे में वे जिस तरह से सामान्य रह गई है वैसे ही मंत्रालय में भी होना है क्योंकि डिग्री हो या मंत्रालय आशीर्वाद से मिल तो सकता है लेकिन सफलता व्यक्तिगत काबिलियत से ही मिलती है. ऐसी स्थिति में डॉ. के लिए भविष्य में बड़ी चुनौती है.

Wednesday, 10 August 2016

अध्यक्ष की कुर्सी पर अमित शाह "ख़ासमख़ास" हैं



"बीजेपी के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ी थीकिन्तु किन्तु ख़ासमख़ास अमित शाह के आगे भला किसकी क्या मजाल?"



भारतीय जनता पार्टी में यूं तो एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता आये हैं, जिन्होंने अध्यक्ष पद की कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ रखी है, पर कहना पड़ेगा कि अमित शाह जी इन सबमें 'ख़ास' हैं! ख़ास ही क्यों, बल्कि उन्हें 'ख़ासमख़ास' कहना ज्यादा उचित होगा. कोई ये न समझ ले कि 'ख़ास और ख़ासमख़ास' का सफर इतनी आसानी से तय किया जाता है, बल्कि उसके लिए 'ख़ास' काम भी करने पड़ते हैं, जिसे राजनीतिक भाषा में 'तीर' मारना कहते हैं. अमित शाह जी के तरकश में यूं तो कई तीर भरे हैं, जिन्हें वह अक्सर मारते ही रहते हैं किन्तु हाल के दिनों में उनके दो तीरों की ख़ास चर्चा है.

पहला तीर उन्होंने गुजरात में मारा है, जहाँ अविश्वस्त सूत्रों के अनुसार कहा जा रहा है कि 'साहेब' और 'बेन' की पसंद के बावजूद अमित शाह ने गुजरात फतह की गारंटी लेकर नितिन पटेल को पीछे छोड़ा और विजय रूपाणी को कमान दिलाई. कई खबरियों ने तो यह भेद खोल दिया कि आनंदीबेन और अमित शाह के बीच बैठकों में तू-तू, मैं-मैं भी हुई. पर मूल बात यह है कि अमित शाह का तीर यहाँ निशाने पर लगा और तीर निशाने पर लगते ही अमित भाई, गुजरात छोड़कर यूपी जा पहुंचे!

यूं तो अमित शाह के तगड़े कन्धों पर पूरे देश में भाजपा की जिम्मेदारी है, किन्तु गुजरात और यूपी का तो उन्हें पूरा ठेका मिल गया है. ऐसे में गुजरात-यूपी, गुजरात-यूपी करना उनकी मजबूरी और आने वाले समय की मजबूती भी बन सकता है.

खैर, गुजरात की समस्या सुलझाने के बाद अमित शाह के निशाने पर यूपी का एक बड़ा कैच पकड़ना था और उन्होंने बीएसपी से अलग हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को बीजेपी में शामिल कराकर यह कैच सफलतापूर्वक पकड़ लिया. यूपी में चार बार विधायक रहे स्वामी प्रसाद मौर्या  हालिया दिनों में काफी चर्चित रहे, जब उन्होंने बीएसपी सुप्रीमो मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया. यूपी में भी अविश्वस्त सूत्र बताते हैं कि 'शाह' हर हाल में यूपी का जातीय गणित दुरुस्त करने में लगे हुए हैं, जहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में 8% मौर्य और कुशवाहा वोटों पर उनका यह तीर निशाने पर लग सकता है. यूपी राजनीति को समझने का अमित शाह दावा और दांव तो खूब चल रहे हैं, हालाँकि यूपी के कई नेता उनकी गुजराती स्टाइल को समझ नहीं पा रहे हैं. खबर तो यह भी है कि बीजेपी के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ी थी, किन्तु किन्तु ख़ासमख़ास अमित शाह के आगे भला किसकी क्या मजाल!

वैसे, कुछ ऐसा ही प्रयोग उन्होंने बिहार में 'मांझी' नामक कैच पकड़ कर किया था, पर तौबा-तौबा बिहार की याद कहाँ आ गयी, क्योंकि इस प्रदेश ने तो बिचार अमित शाह की 'हैट्रिक' ख़राब कर दी थी, अन्यथा हरियाणा, महाराष्ट्र के बाद…..!!

खैर, बिहार की कड़वी यादों को वह पीछे छोड़ चुके हैं और यूपी इलेक्शन में अपने 'ख़ास तीरों' से वह जीत की ओर कदम बढ़ाने में लग गए हैं.

Monday, 8 August 2016

भारत छोड़ो आंदोलन में गोरक्षा और खिलाफत एक सिक्के के दो पहलू थे

आज भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ है. और यह ऐसे नाजुक मौके पर आई है, जब देश में गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों की मरम्मत करने के बहाने खोजे जा रहे हैं. प्रधानमंत्री ने भले ही मुसलमानों पर फर्जी गोरक्षकों के हमले को अभी तक सार्वजनिकरूप से स्वीकार न किया हो, लेकिन दलितों पर जुल्म को तो उन्होंने आला दर्जे की भावुकता के साथ स्वीकार किया है. इतनी अच्छी भावुकता तो आजकल फिल्मों में भी देखने को नहीं मिलती. बहरहाल इस मौके पर महात्मा गांधी के 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में दिए भाषण की याद कर लेना चाहिए. यही वह भाषण था जिसके अंत में ‘करेंगे या मरेंगे’ का नारा निकला और अंत में आजादी की लड़ाई आजादी की चौखट तक पहुंची.

इस भाषण की शुरुआत अगर कम्युनिस्टों को फटकार के साथ हुई, तो एक बड़ा हिस्सा मुसलमानों को यह समझाने में हुआ कि यह देश सबका बराबर का देश है, लिहाजा उन्हें पाकिस्तान की नाजायज मांग का समर्थन नहीं करना चाहिए. और मुसलमानों को यह बात समझाने के लिए गांधीजी ने गोरक्षा की मिसाल भी दी. यह उस फरिश्ते की ही सिफत थी कि उसने खिलाफत और गोरक्षा को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया.

जरा भाषण के इस अंश पर गौर करें, ‘‘हजारों मुसलमान मुझसे कहते हैं कि अगर हिंदू-मुसलमान का सवाल पक्के तौर पर सुलझाया जाना है, तो इसे मेरे जीते जी सुलझा लिया जाना चाहिए. वैसे तो मुझे इस बात पर खुश होना चाहिए, लेकिन मैं ऐसी तजवीज को कैसे मानलूं जिसकी कोई तुक मेरी समझ में नहीं आती? हिंदू-मुस्लिम एकता कोई नई चीज नहीं है. करोड़ों हिंदू-मुसलमान यही चाहते हैं. मैं तो बचपन से ही सोच-विचारकर इस काम में लगा हूं. जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब मैंने इस बात की खास कोशिश की कि मुसलमान और पारसियों से मेरी दोस्ती हो. मुझे उस छोटी उम्र में भी भरोसा था कि अगर भारत के हिंदू अन्य समुदायों के साथ शांति से रहना चाहते हैं तो उन्हें भाईचारे की भावना पैदा करनी होगी... दक्षिण अफ्रीका में भी मैंने मुसलमान और पारसी दोस्त बनाए. और आखिर में जब भारत लौटा तो वे मेरे जाने से दुखी थे, उनकी आंखों में आंसू थे.

भारत में भी मैंने यही एकता हासिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एकता मेरी जिंदगी भर की अभिलाषा थी और इसी ने मुझे खिलाफत आंदोलन में मुसलमानों का साथ देने को प्रेरित किया. मुसलमानों ने पूरे देश में मुझे अपना सच्चा दोस्त माना.

तो फिर आज ऐसा क्या हो गया कि आज मैं (मुसलमानों के लिए) शैतान और अरुचिकर हो गया. क्या खिलाफत आंदोलन की हिंदू-मुस्लिम एकता मैंने किसी फरसे के जोर पर हासिल की थी. सच्चाई यह है कि मेरा अंतरयामी कहता था कि ऐसा करने से में गोरक्षा भी कर सकूंगा. मैं गो-पूजक हूं. मैं यह मानता हूं कि मैं और गाय एक ही ईश्वर की संतान हैं. गाय के प्राणों की रक्षा के लिए मैं अपने प्राणा न्योछावार करने को तैयार हूं. मेरा जीवन दर्शन और मेरी परम आशाएं कुछ भी हो सकती हैं, लेकिन खिलाफत आंदोलन से मैं किसी मोल-भाव की मंशा से नहीं जुड़ा था. खिलाफत आंदोलन से मैं इसलिए जुड़ा ताकि संकट की घड़ी में मैं अपने पड़ोसी के साथ खड़ा हो सकूं. अगर आज अली बंधु जीवित होते तो वे मेरी बात की सच्चाई के सबूत देते. और बहुत से लोग यह भी बताते की मैंने यह काम गाय का जीवन बचाने के लिए मोलभाव के तौर पर नहीं किया था. गाय और खिलाफत दोनों का महत्व उनके अपने गुणों के आधार पर है. एक ईमानदार आदमी, सच्चे पड़ोसी और वफादार दोस्त के नाते यह लाजिम था कि गाढ़े वक्त में मैं मुसलमानों के साथ खड़ा होऊं.’’

इस भाषण में आगे मोहम्मद अली जिन्ना के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग किया गया और दलित हितों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दुहराई गई. वैसे गाय को लेकर गांधी जी के ये विचार इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें और साफ करने की कोई जरूरत नहीं है, फिर भी इतना कह लूं तो बहुत ज्यादा बेअदबी नहीं होगी कि बापू यही समझा रहे थे कि अगर वह मुसलमानों को अपना दोस्त बना लेंगे, उनका दिल जीत लेंगे और उनके गाढ़े वक्त में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाएंगे तो आखिर को मुसलमान भी गोसेवा में उनके साथ आ जाएंगे. हां, यह भी याद रखिए कि गांधी गाय की रक्षा के लिए जान दांव पर लगाने की बात कह रहे थे, किसी की जान लेने की नहीं.

भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ पर बापू का यह सबक याद रखने में कुछ हर्ज है क्या?