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Friday, 30 September 2016

कर दो मुझे भी देश द्रोही घोषित


आज देश में वह दौर चल रहा है कि हर किसी को सर्टिफिकेट में कैद किया जा रहा है. आप आरएसएस के विचारों को नहीं मानाते तो आप देशद्रोही हो, केजरीवाल के  नहीं तो बेईमान हो, कांग्रेस के नहीं तो सांप्रदायिक हो. सीधा सा फंडा है कि आप मेरे नहीं तो उसके हो. कुल मिलकर सुनने में अच्छा लगे ऐसे एक शब्द को पकड़ कर हर पार्टी ने अपना ट्रेडमार्क कर लिया है. फिर क्यों ना उस पार्टी का उस शब्द के विचारधाराओं से नहाने-निचोने के भी ताल्लुक ना हो.
अभी देश में राष्ट्रवाद की हवा जोरो पर है. इस राष्ट्रवाद नाम की चिड़िया का ट्रेडमार्क इस देश के माननीय  दलितपुत्र, माँ के लाडले, आरएसएस कैडर प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के नाम है. जो मोदी का है वही राष्ट्रवादी है बाकि सब देशद्रोही. मोदी मतलब राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद मतलब मोदी. मोदी मतलब राष्ट्र, राष्ट्र मतलब मोदी. राष्ट्र मतलब भारत, भारत मतलब मोदी. इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा!
आज कल राष्ट्रवादी और देशद्रोही का तमगे थोक के भाव में बिक रहा है. हालाँकि इस तमगे के जनक हमारे माननीय ईमानदार श्री श्री केजरी बाबू थे लेकिन आज कल उनके ईमानदारी के तमगे का रेट काफी शेयर बाजार की तरह लेवाली में लुढ़क गया है. अभी तो बस राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद है बिकता है. वैसे काम कांग्रेस भी नहीं है उसने भी अपने धर्मनिरपेक्षता का आईपीओ बड़े धूम-धड़ाके से लांच किया था लेकिन राहुल बाबा के कमजोर इमेज के चलते निवेशकों में कुछ खास भरोसा नहीं जमा. लेकिन फिर भी राहुल बाबा मार्केट में डेट हुए है. जबसे हनुमान गढ़ी- अयोध्या जा कर बाबा ने बजरंगबली के दर्शन "लिए" है तबसे बाबा के पौरुषत्व में जबरदस्त इजाफा हुआ है. 
हाँ तो हम क्या बात कर रहे थे...राष्ट्रवाद! राष्ट्रवाद का तमगा आज कल माननीय और गण दे रहे है. जितना ज्यादा चाहो उतना ले सकते हो. बेचने वाले लाइन लगा कर, बाजार बिछाकर तैयार है. बेचे जा रहे है. एक तरफ से सबकुछ बेचे जा रहे है. राष्ट्रवाद मय राष्ट्रवाद! फिर चाहे प्रधानमंत्री की गरिमा हो या सीमा, हमारे सिपाहियों की लाशें हो या किसी कफ़न में में लिपटे माँ के लाल! सबकुछ बेचा जा रहा है. ऐसे हालात में यदि आप कुछ बोलते हो तो आप सिर्फ बदनसीब देशद्रोही हो.
पठानकोट और उरी के बाद राष्ट्रवाद का शेयर काफी टूट गया था. बहुमत में लोग  "घर से ना जाये" इस डर से बेचने लगे थे. बाजार को लुढ़कने से बचाने लिए दलालों के नए उपनाम चारणभाट संपादकों का भी खूब उपयोग किया गया. कही सर्जिकल स्ट्राइक हुई तो कही सिंधु, चेनाब, झेलम, रावी, सतलज आदि के लाखो क्यूसेक पानी संपादक गण पी गए. लेकिन फिर भी बाजार पटरी पर नहीं आया प्रोडक्ट रिलांच हुआ. जिसे नाम दिया गया सर्जिकल स्ट्राइक!
सर्जिकल स्ट्राइक कितना सही हुआ है कितना गलत! यह तो आने वाला वक्त बताएगा क्योंकिं दावे 38  से पचास के है लेकिन अभी तक साबित सिर्फ दो का ही है. चलो दो भी है तो अच्छा है. वैसे भी मारने वाले गिनते नहीं और और गिनाने वाले मारते नहीं.
मुद्दा यह नहीं कि कितने? लेकिन जितना भी हुआ है वह सिर्फ एक मार्केट बचाने की स्ट्रैटजी है इससे ज्यादा कुछ नहीं ! यह यूपी, गुजरात, पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में गिरते मार्केट को रोकने के लिए किया गया डैमेज कंट्रोल है. यदि यह डैमेज कंट्रोल ना होता तो सरकार को इतना प्रोपेगेट करने की जरुरत ही नहीं पड़ती. आज से पहले भी सर्जिकल ऑपरेशन हुए है लेकिन किसी भी सरकार ने यों धतिंग नाच नहीं किया. 2007 और 2013 में भी आर्मी ने किया था लेकिन कितने लोगों को मालूम कि ऐसा कुछ हुआ था?
सरकार ने सीधे-सीधे अपने चुनावी एजेंडे पर 150  सैनिकों को दांव पर लगा दिया था. सरकारी भाषा में मान ले कि सैनिकों का काम है यह तो पलटवार 12 दिन पहले भी हो सकता था लेकिन सरकार को मालूम है युद्ध मतलब मंहगाई और मंहगाई यदि बढ़ी तो जिस सत्ता-शासन के लिए इतना धतिंग-नाच चल रहा है वह बेकार जाता. इसलिए सरकार युद्ध से दूर है लेकिन यदि सरकार 2018 ऐसे तक ऐसे ही सरकार मुद्दों पर फेल रहेगी और वादे बस चुनावी जुमले होंगे तो सरकार फिर युद्ध भी करेगी. क्योंकि घर बचाने का यह सबसे पुराना रास्ता है कि जब मुखिया घर को ठीक से नहीं चला पा रहा होता है तो पडोसी से झगड़ा कर लेता है.
क्यों मैं इस सर्जिकल ऑपरेशन के खिलाफ हूँ?
मेरे यह कहते ही कि मैं इस ऑपरेशन के खिलाफ हूँ जल्दी मुझे भी देशद्रोही का तमगा मिल जाने वाला है लेकिन फिर भी मैं हूँ. क्योंकि यह ऑपरेशन मैं रैंप पर सुंदरियों के कपडे गिरा देने वाले स्टंट से ज्यादा कुछ भी नहीं मानता. सरकार ने भी कपडे गिरा कर स्टंट किया है. अगर ऐसा नहीं होता तो कोई भी सरकार अपने डिफेन्स सिस्टम के मामले को पब्लिसाइज नहीं करती. करती है तो बस उतना ही कि कट टू कट समाचार जाये और देश की जनता मोटिवेट हो सके. लेकिन ऐसे नंग नाच नहीं होता.
दुसरी बात कि यदि सरकार के इरादे मजबूत होते तो ऑपरेशन बड़े स्तर पर होता पब्लिसिटी नहीं. यह थोथा चना बाजे घना वाली बात है.
तीसरी और सबसे मजबूत वजह है कि सरकार ने इतने छोटे से ऑपरेशन को इतना पब्लिसाइज़ करके देश की सुरक्षा को बड़े स्तर से नुकसान किया है. पाकिस्तानी सेना का अपने विकास के लिए लड़ने का व्यवहार नहीं है बल्कि वहां कि सेना और जनता दोनों विचारधारा से चलती है और वह विचारधारा है धार्मिक उन्माद की विचारधार. जिसे पूरे दुनिया में अपने खलीफा को स्थापित करना है. अभी तक यह  खलीफा वाली विचारधारा सिर्फ आतंकी गुटों और आर्मी के कुछ पक्षों पर ही हावी था लेकिन जब देश की संप्रभुता को खतरा हो तो समस्त नागरिको की विचारधार एक होती है. जो आतंकी मास(mass) से साइड हुए थे अब वे मेइन स्ट्रीम में आ जायेंगे. सामान्य जन उनकी भाषा बोलेगा. कितनों का सर्जिकल ऑपरेशन करोगे?

अपनी जनता नशे में डूब गई है वही दुश्मन चौकन्ना हो गया है. लो अब कर दो मुझे भी देश द्रोही घोषित!

Wednesday, 10 August 2016

अध्यक्ष की कुर्सी पर अमित शाह "ख़ासमख़ास" हैं



"बीजेपी के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ी थीकिन्तु किन्तु ख़ासमख़ास अमित शाह के आगे भला किसकी क्या मजाल?"



भारतीय जनता पार्टी में यूं तो एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता आये हैं, जिन्होंने अध्यक्ष पद की कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ रखी है, पर कहना पड़ेगा कि अमित शाह जी इन सबमें 'ख़ास' हैं! ख़ास ही क्यों, बल्कि उन्हें 'ख़ासमख़ास' कहना ज्यादा उचित होगा. कोई ये न समझ ले कि 'ख़ास और ख़ासमख़ास' का सफर इतनी आसानी से तय किया जाता है, बल्कि उसके लिए 'ख़ास' काम भी करने पड़ते हैं, जिसे राजनीतिक भाषा में 'तीर' मारना कहते हैं. अमित शाह जी के तरकश में यूं तो कई तीर भरे हैं, जिन्हें वह अक्सर मारते ही रहते हैं किन्तु हाल के दिनों में उनके दो तीरों की ख़ास चर्चा है.

पहला तीर उन्होंने गुजरात में मारा है, जहाँ अविश्वस्त सूत्रों के अनुसार कहा जा रहा है कि 'साहेब' और 'बेन' की पसंद के बावजूद अमित शाह ने गुजरात फतह की गारंटी लेकर नितिन पटेल को पीछे छोड़ा और विजय रूपाणी को कमान दिलाई. कई खबरियों ने तो यह भेद खोल दिया कि आनंदीबेन और अमित शाह के बीच बैठकों में तू-तू, मैं-मैं भी हुई. पर मूल बात यह है कि अमित शाह का तीर यहाँ निशाने पर लगा और तीर निशाने पर लगते ही अमित भाई, गुजरात छोड़कर यूपी जा पहुंचे!

यूं तो अमित शाह के तगड़े कन्धों पर पूरे देश में भाजपा की जिम्मेदारी है, किन्तु गुजरात और यूपी का तो उन्हें पूरा ठेका मिल गया है. ऐसे में गुजरात-यूपी, गुजरात-यूपी करना उनकी मजबूरी और आने वाले समय की मजबूती भी बन सकता है.

खैर, गुजरात की समस्या सुलझाने के बाद अमित शाह के निशाने पर यूपी का एक बड़ा कैच पकड़ना था और उन्होंने बीएसपी से अलग हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को बीजेपी में शामिल कराकर यह कैच सफलतापूर्वक पकड़ लिया. यूपी में चार बार विधायक रहे स्वामी प्रसाद मौर्या  हालिया दिनों में काफी चर्चित रहे, जब उन्होंने बीएसपी सुप्रीमो मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया. यूपी में भी अविश्वस्त सूत्र बताते हैं कि 'शाह' हर हाल में यूपी का जातीय गणित दुरुस्त करने में लगे हुए हैं, जहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में 8% मौर्य और कुशवाहा वोटों पर उनका यह तीर निशाने पर लग सकता है. यूपी राजनीति को समझने का अमित शाह दावा और दांव तो खूब चल रहे हैं, हालाँकि यूपी के कई नेता उनकी गुजराती स्टाइल को समझ नहीं पा रहे हैं. खबर तो यह भी है कि बीजेपी के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ी थी, किन्तु किन्तु ख़ासमख़ास अमित शाह के आगे भला किसकी क्या मजाल!

वैसे, कुछ ऐसा ही प्रयोग उन्होंने बिहार में 'मांझी' नामक कैच पकड़ कर किया था, पर तौबा-तौबा बिहार की याद कहाँ आ गयी, क्योंकि इस प्रदेश ने तो बिचार अमित शाह की 'हैट्रिक' ख़राब कर दी थी, अन्यथा हरियाणा, महाराष्ट्र के बाद…..!!

खैर, बिहार की कड़वी यादों को वह पीछे छोड़ चुके हैं और यूपी इलेक्शन में अपने 'ख़ास तीरों' से वह जीत की ओर कदम बढ़ाने में लग गए हैं.

Tuesday, 2 February 2016

‘‘नाकामी का जीता-जागता स्मारक" पर क्यों बज रही ताली: मनरेगा


10 साल मनरेगा के
आज महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के 10 साल पूरे हो रहे गए। पहले ‘मनरेगा’ के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने वाली मोदी सरकार ने मंगलवार को इस योजना की तारीफ करते हुए कहा कि एक दशक की इसकी उपलब्धि राष्ट्रीय गर्व और उत्सव का विषय है।

यह योजना 2 फ़रवरी 2006 को 200 जिलों में शुरू की गई, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में विस्तारित किया गया और 1 अप्रैल 2008 तक अंततः भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। 2006-2007 में परिव्यय 110 बीलियन रुपए था, जो 2009-2010 में तेज़ी से बढ़ते हुए 391 बीलियन (पिछले 2008-2009 बजट की तुलना में राशि में 140% वृद्धि) रूपए हो गया। इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद से इस पर 313844 करोड़ रूपये खर्च हुआ जिसमें से 71 प्रतिशत मजदूरी का भुगतान करने में किया गया। इसके तहत 20 प्रतिशत कार्य अनुसूचित जाति वर्ग के मजदूरों और 17 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वर्ग के मजदूरों को प्रदान किया गया ।  2008-09 के दौरान 4,49,40,870 ग्रामीण परिवारों को मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराया गया


महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जिसे 25 अगस्त 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया गया।  बेल्जियम में जन्मे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में कार्यरत् अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की इस परियोजना के पीछे एक अहम भूमिका है। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है जो प्रतिदिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से पिछली यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ की तारीफ करने पर कांग्रेस ने कहा कि  देर आए दुरूस्त आए। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार ‘मनरेगा’ का मखौल उड़ाते हुए कहा था कि यह पिछले 60 सालों में गरीबी नहीं मिटा पाई कांग्रेस की ‘‘नाकामी का जीता-जागता स्मारक है।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भाजपा और मोदी सरकार के बदलते रवैया पर कहा कि देर आए दुरूस्त आए । अगर कोई कुछ अच्छी बात कहता है तो इसकी तारीफ करने की जरूरत है। यह दिखाता है कि इस अहम कानून से कैसे ग्रामीण गरीबों की जिंदगी में बदलाव लाने का काम किया।


अब मेरी बात-
मोदी ने एक समय इसी योजना को कांग्रेस के नाकामयाबी का स्मारक बताय था. आज वे ही इसकी तारीफ कर रहे. क्यों कर रहे तारीफ साहब? क्या इस देश के लोगो का पेट डिजिटल इंडिया से नहीं भरा जो आपको भी अब मनरेगा रास आने लगा है? या फिर जो आपने सपनों के हवाई किले खड़े किये थे वे ढहते महसूस हो रहे, जो अब मनरेगा भाने लगा है. साहब जुबान चलाना आसान है भूखी जनता के पेट की रोटी चलाना बहुत मुश्किल. मैं जनता हूँ साहब आप गलत नहीं हो, आप इस देश को सवांरने के लिए अपना जी जान दे रहे हो लेकिन साहब कल वालों ने उतने भी पाप नहीं किये थे, जो आपने उन्हें कंस बना दिया.

मुझे नहीं चाहिए मनरेगा साहब. आई लव डिजिटल इंडिया, आई लव आईफोन, आई लव मैक, आई लव शॉप ओन डिजिटल प्लेटफार्म फ्रॉम माय इतालियन फर्निश बैडरूम, बट बिफोर आल ऑफ़ इट, आई नीड ब्रेड! 80% से ज्यादा देश बेरोजगार अथवा जरुरत से काम आय से पीड़ित है, उसे रोटी चाहिए. पहले उसको दो जून की रोटी चाहिए फिर बुलेट ट्रैन और आईफोन .

नोट- कांग्रेस में तुम्हें सबसे नकारी और आलसी सरकार मानता हूँ.

किसान को सिर्फ सब्सिडी की बैसाखी नहीं , सरकार के सक्रिय समर्थन की जरूरत है.





पिछले अनेक वर्षों से महाराष्ट्र में विदर्भ ही नहीं, देश के कई अन्य भागों में फसल खराब होने के कारण कर्ज चुकाने में अक्षम किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं करते आ रहे हैं. केन्द्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012, 2013 एवं 2014 में कृषि से जुड़े कारणों ने 3313 किसानों को आत्महत्या करने पर विवश किया. इनमें से 3301 आत्महत्याएं केवल पांच राज्यों, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में हुईं. 1999 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और 2010 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने किसानों को सुरक्षा देने की दृष्टि से फसल बीमा योजना लागू की थी लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है. इससे निश्चय ही किसानों को खराब फसल होने की स्थिति में काफी राहत मिलेगी.

योजना में यह प्रावधान है कि किसान अपनी फसल का जितनी रकम का बीमा करा रहा है, उसके लिए दिये जाने वाले प्रीमियम का रबी की फसल के लिए सिर्फ 1.5 प्रतिशत और खरीफ की फसल के लिए केवल दो प्रतिशत प्रीमियम ही देगा. शेष प्रीमियम सरकार अदा करेगी. लेकिन फसल खराब होने की स्थिति में उसे बीमे की पूरी रकम क्लेम में मिल सकेगी. सरकार को आशा है कि लगभग 50 प्रतिशत किसान इस योजना का लाभ उठा पाएंगे. अनुमान है कि प्रतिवर्ष इस पर सरकारी कोष से साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये दिए जाएंगे.
यह योजना ऐसे समय में आई है जब लोग यह जान कर चौंक पड़े हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने उद्योगपतियों का एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज माफ कर दिया है. ऐसे में यदि किसान छोटी-छोटी रकम के लिए आत्महत्याएं कर रहे हैं तो इससे जनता में आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है. इस स्थिति को टालने के लिए मोदी सरकार ने फसल बीमा योजना घोषित की है. निकट भविष्य में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. जाहिर है कि योजना की घोषणा उन्हें ध्यान में रखकर की गई है. लेकिन लोकतंत्र में ऐसा होना स्वाभाविक है और इससे योजना के लाभकारी चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. उम्मीद यही है कि, जैसा कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है, इस योजना से किसानों को एक सुरक्षा कवच मिलेगा.



लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कृषि क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है क्योंकि कृषि करना अब लाभ का काम नहीं रह गया है. पिछली सभी सरकारों ने और वर्तमान सरकार ने भी कृषि क्षेत्र में निवेश करने से गुरेज किया है और अपना पूरा ध्यान उद्योग को समर्थन देने पर केन्द्रित किया है. इसलिए अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व और भूमिका भी घटते गए हैं और अनेक कृषि उत्पादों के लिए हमारी आयात पर निर्भरता बढ़ती गई है. यदि वर्तमान केंद्र सरकार इस ओर भी ध्यान दे और इस असंतुलन को ठीक करे, तो वह कृषि के लिए दूरगामी महत्व का कदम होगा. किसान को सिर्फ सब्सिडी की बैसाखी की जरूरत नहीं है, उसे अपना कृषिकर्म सुचारू रूप से कर पाने के लिए सरकार के सक्रिय समर्थन की जरूरत है.

Tuesday, 12 January 2016

समृद्ध, शांतिमय, युवा भारत
स्वामी विवेकानंद की 154वीं जयंती युवा दिवस के मौके पर युवा दिवस की बधाई

Nanubhai Vanani- Youth and Culture Minister gujarat
नानुभाई वाननी, मंत्री युवा एवं संस्कृति ने स्वामी विवेकानंद की 154वीं जयंती युवा दिवस के मौके पर युवाओं को बधाई देते हुए कहा कि "भारत सबसे ज्यादा युवाओं का देश है युवानों के विकास के लिए राज्य सरकार और भारत सरकार जब कटिबद्ध है तब आओ हम सब साथ मिलकर युवानों के माध्यम द्वारा भारत को समृद्ध और शांतिमय बनायें."
Namo With Kalam in the days of Modi's Youth agenda
हालाँकि जिस तरह से 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस चमक दमक के साथ स्वामी विवेकानंद जन्म जयंती को युवा दिवस के रूप में शुरू किया था ऐसे किसी भी कार्यक्रम की संभावना से नानुभाई नकार गए. उन्होंने बताया," इस बार हम कोई पुब्लिक प्रोग्राम नहीं कर रहे.
ज्ञात हो, 2012 में वतर्मान प्रधानमंत्री ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए बड़ी धूमधाम से महात्मा मंदिर पर जयंती मनाया था. जयंती में पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. मुख्यअतिथि थे. मोदी अपने युवा आधारित राजनीति को इसी महोत्सव से ऊपर उठा कर वे देश भर के युवाओं के केंद्र बन गए थे. उस समय एवं बाद में मोदी ने विवेकानंद के नाम से विवेकानंद स्किल डेवलपमेंट सेंटर्स आदिक तमाम तरह की युवालक्षी योजनाओं की शुरुवात की थी. लेकिन मुख्यमंत्री बदलाव के साथ ही वे योजनाएं भी या तो बंद हो गई अथवा धीमी पड़ गई.


In Today Sandesh
http://www.sandesh.com/article.aspx?newsid=3218404