10 साल मनरेगा के
आज महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के 10 साल पूरे हो रहे गए। पहले ‘मनरेगा’ के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने वाली मोदी सरकार ने मंगलवार को इस योजना की तारीफ करते हुए कहा कि एक दशक की इसकी उपलब्धि राष्ट्रीय गर्व और उत्सव का विषय है।
यह योजना 2 फ़रवरी 2006 को 200 जिलों में शुरू की गई, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में विस्तारित किया गया और 1 अप्रैल 2008 तक अंततः भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। 2006-2007 में परिव्यय 110 बीलियन रुपए था, जो 2009-2010 में तेज़ी से बढ़ते हुए 391 बीलियन (पिछले 2008-2009 बजट की तुलना में राशि में 140% वृद्धि) रूपए हो गया। इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद से इस पर 313844 करोड़ रूपये खर्च हुआ जिसमें से 71 प्रतिशत मजदूरी का भुगतान करने में किया गया। इसके तहत 20 प्रतिशत कार्य अनुसूचित जाति वर्ग के मजदूरों और 17 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वर्ग के मजदूरों को प्रदान किया गया । 2008-09 के दौरान 4,49,40,870 ग्रामीण परिवारों को मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराया गया ।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जिसे 25 अगस्त 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया गया। बेल्जियम में जन्मे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में कार्यरत् अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की इस परियोजना के पीछे एक अहम भूमिका है। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है जो प्रतिदिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं।
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से पिछली यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ की तारीफ करने पर कांग्रेस ने कहा कि देर आए दुरूस्त आए। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार ‘मनरेगा’ का मखौल उड़ाते हुए कहा था कि यह पिछले 60 सालों में गरीबी नहीं मिटा पाई कांग्रेस की ‘‘नाकामी का जीता-जागता स्मारक है।
कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भाजपा और मोदी सरकार के बदलते रवैया पर कहा कि देर आए दुरूस्त आए । अगर कोई कुछ अच्छी बात कहता है तो इसकी तारीफ करने की जरूरत है। यह दिखाता है कि इस अहम कानून से कैसे ग्रामीण गरीबों की जिंदगी में बदलाव लाने का काम किया।
अब मेरी बात-
मोदी ने एक समय इसी योजना को कांग्रेस के नाकामयाबी का स्मारक बताय था. आज वे ही इसकी तारीफ कर रहे. क्यों कर रहे तारीफ साहब? क्या इस देश के लोगो का पेट डिजिटल इंडिया से नहीं भरा जो आपको भी अब मनरेगा रास आने लगा है? या फिर जो आपने सपनों के हवाई किले खड़े किये थे वे ढहते महसूस हो रहे, जो अब मनरेगा भाने लगा है. साहब जुबान चलाना आसान है भूखी जनता के पेट की रोटी चलाना बहुत मुश्किल. मैं जनता हूँ साहब आप गलत नहीं हो, आप इस देश को सवांरने के लिए अपना जी जान दे रहे हो लेकिन साहब कल वालों ने उतने भी पाप नहीं किये थे, जो आपने उन्हें कंस बना दिया.
मुझे नहीं चाहिए मनरेगा साहब. आई लव डिजिटल इंडिया, आई लव आईफोन, आई लव मैक, आई लव शॉप ओन डिजिटल प्लेटफार्म फ्रॉम माय इतालियन फर्निश बैडरूम, बट बिफोर आल ऑफ़ इट, आई नीड ब्रेड! 80% से ज्यादा देश बेरोजगार अथवा जरुरत से काम आय से पीड़ित है, उसे रोटी चाहिए. पहले उसको दो जून की रोटी चाहिए फिर बुलेट ट्रैन और आईफोन .
नोट- कांग्रेस में तुम्हें सबसे नकारी और आलसी सरकार मानता हूँ.


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