पिछले अनेक वर्षों से महाराष्ट्र में विदर्भ ही नहीं, देश के कई अन्य भागों में फसल खराब होने के कारण कर्ज चुकाने में अक्षम किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं करते आ रहे हैं. केन्द्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012, 2013 एवं 2014 में कृषि से जुड़े कारणों ने 3313 किसानों को आत्महत्या करने पर विवश किया. इनमें से 3301 आत्महत्याएं केवल पांच राज्यों, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में हुईं. 1999 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और 2010 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने किसानों को सुरक्षा देने की दृष्टि से फसल बीमा योजना लागू की थी लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है. इससे निश्चय ही किसानों को खराब फसल होने की स्थिति में काफी राहत मिलेगी.
योजना में यह प्रावधान है कि किसान अपनी फसल का जितनी रकम का बीमा करा रहा है, उसके लिए दिये जाने वाले प्रीमियम का रबी की फसल के लिए सिर्फ 1.5 प्रतिशत और खरीफ की फसल के लिए केवल दो प्रतिशत प्रीमियम ही देगा. शेष प्रीमियम सरकार अदा करेगी. लेकिन फसल खराब होने की स्थिति में उसे बीमे की पूरी रकम क्लेम में मिल सकेगी. सरकार को आशा है कि लगभग 50 प्रतिशत किसान इस योजना का लाभ उठा पाएंगे. अनुमान है कि प्रतिवर्ष इस पर सरकारी कोष से साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये दिए जाएंगे.
यह योजना ऐसे समय में आई है जब लोग यह जान कर चौंक पड़े हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने उद्योगपतियों का एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज माफ कर दिया है. ऐसे में यदि किसान छोटी-छोटी रकम के लिए आत्महत्याएं कर रहे हैं तो इससे जनता में आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है. इस स्थिति को टालने के लिए मोदी सरकार ने फसल बीमा योजना घोषित की है. निकट भविष्य में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. जाहिर है कि योजना की घोषणा उन्हें ध्यान में रखकर की गई है. लेकिन लोकतंत्र में ऐसा होना स्वाभाविक है और इससे योजना के लाभकारी चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. उम्मीद यही है कि, जैसा कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है, इस योजना से किसानों को एक सुरक्षा कवच मिलेगा.
लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कृषि क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है क्योंकि कृषि करना अब लाभ का काम नहीं रह गया है. पिछली सभी सरकारों ने और वर्तमान सरकार ने भी कृषि क्षेत्र में निवेश करने से गुरेज किया है और अपना पूरा ध्यान उद्योग को समर्थन देने पर केन्द्रित किया है. इसलिए अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व और भूमिका भी घटते गए हैं और अनेक कृषि उत्पादों के लिए हमारी आयात पर निर्भरता बढ़ती गई है. यदि वर्तमान केंद्र सरकार इस ओर भी ध्यान दे और इस असंतुलन को ठीक करे, तो वह कृषि के लिए दूरगामी महत्व का कदम होगा. किसान को सिर्फ सब्सिडी की बैसाखी की जरूरत नहीं है, उसे अपना कृषिकर्म सुचारू रूप से कर पाने के लिए सरकार के सक्रिय समर्थन की जरूरत है.


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