Sunday, 15 December 2013

गर्त में पूर्वोत्तर



पिछले सप्ताह मैंने उत्तर प्रदेश का यात्रा किया। जहाँ के मतदान शायद भारतीय राजनीति में सबसे अहम् भूमिका अदा करने के साथ, भारत की दशा-दिशा तय करते हैं। लेकिन यह देख ताज्जुब के साथ क्रोध भी आया कि वहाँ मुद्दे नहीं लहर है। वहाँ के, जरुरत के मुद्दे के ऐसा नहीं कि सिर्फ वही के लिए हो, वरन वे देश के लिए भी जरुरी हैं लेकिन अफ़सोस उन मुद्दों पर नेता, पत्र-पत्रकार, स्व-कथित सामाजिक ठेकेदार, यहाँ तक कि मतदाता भी ध्यान नहीं देना चाहते।

कृषि सुधार उत्तर प्रदेश  का सबसे अहम् मुद्दा और जरुरत है लेकिन हर कोई इस मुद्दे पर चुप्पी साधते नजर आ रहा है। यह सबसे दयनीय स्थित है कि जहाँ के पैदावार से तीन और देश का पेट भर जाये वहाँ के किसान खुद रो रहे हैं और इनके पीछे कोई माँ-बाप नहीं हैं। उत्तर-पश्चिमी किसानों के हालत तो फिर भी ठीक हैं लेकिन पूर्वी के किसानों के हालत बाद से बदतर है। इस क्षेत्र के सबसे अहम् नगदी फसल के रूप में गन्ने को माना जाता है लेकिन सबसे बुरे हालत गन्ना उत्पादक किसानों के ही हैं। महीनों चले नूरा-कुश्ती के बाद अंततः चीनी मिल मालिकों ने मिल शुरू तो किया लेकिन उससे किसान नहीं सिर्फ सरकार को वोट-चंदे और मिल मालिकों को फायदा होने वाला है।

अखिलेश यादव सरकार ने चीनी मिलों के लिए अपना पिटारा खोल दिया। सरकार चीनी पर प्रवेश कर और गन्ना क्रय की छूट पहले ही दे चुकी है। चालू सत्र में गन्ना समितियों के कमीशन की भरपाई प्रदेश सरकार करेगी। इससे चीनी मिलों को करीब पाँच सौ करोड़ रुपये लाभ मिलेगा। प्रवेश कर में छूट से दो सौ उन्नीस करोड़ की राहत, तो गन्ना क्रय कर में एक सौ साठ करोड़ रुपये की रियायत दी गई है। शीरा बिक्री पर नियंत्रण हटाने से चीनी उद्योग को एक सौ सड़सठ करोड़ का लाभ होगा यानी एक हजार छयालीस करोड़ रुपये की रियायत चालू सीजन में शुगर इंडस्ट्री को दी गई हैं। मिलें गन्ना मूल्य दो सौ अस्सी रुपये प्रति क्विंटल अदा करने पर राजी हैं, लेकिन इसका भुगतान दो किस्तों में किया जाएगा। मिलें किसानों को दो सौ साठ रुपए तुरंत गन्ना लेते वक्त करेंगी और शेष बीस रुपए पेराई सत्र के पूरा होने से पहले दे दिए जाएंगे।

अब यहाँ ध्यान देने लायक यह बात है कि दो सौ अस्सी रुपये तो गत वर्ष भी गन्ने का मूल्य था तो फिर इसमे किसानों को क्या मिल रहा है? हर जगह मंहगाई मार पड़ रही है तो क्या किसान सबकुछ सस्ते में खरीद रहा है, उसके लागत में कोई इजाफा नहीं हो रहा है। किसानों के जरुरत से सम्बंधित सारी वस्तु, चाहे उनके घर की हों या फिर खेती की सब यथास्थित हैं. जैविक, पानी, बीज, मेहनत-मजदूरी सब जस के तस हैं. कहीं कोई इजाफा नहीं है? और यदि है तो उन्हें इजाफा क्यों नहीं दिया जाता।

लेकिन कोई इसके खिलाफ नहीं बोल रहा है बल्कि सब मिल शुरू हो गई इसी बात का जश्न मनाये जा रहे हैं। क्योंकि किसान सिर्फ किसान है। उसका कोई जाति-धर्म मज़हब नहीं है। वह खुद खाने को तरस रहा है फिर किसी को चंदा क्या देगा, फिर क्यों कोई उसकी आवाज़ को बुलंद करे। कुछ जो स्व-कथित किसान समर्थक उपज भी आये है वे किसान पैरोकार कम शासन के दलाल ज्यादा हैं। जो इसी ताक में होते हैं कि थोड़ा हो-हल्ला मचा कर रखो ताकि वक्त पर किसान वोट का थोक में सौदा किया जा सके।

लगभग एक महीने देर से शुरू हुई मिलों ने गेहूँ के आगामी फसल को पूरी तरह निगल लिया है। खेतों से गन्ना खाली न होने के कारण अभी तक गेहूं की पाँच फीसदी भी बुआई नहीं हो सकी है, जबकि दस दिसंबर तक गेहूं की सौ फीसदी बुआई की जानी थी। इस बार गेहूं के क्षेत्रफल के साथ प्रति हेक्टेयर पाँच क्विंटल उत्पादन बढ़ाने की योजना भी कृषि विभाग ने बना रखी थी, लेकिन ये सभी धरी की धरी रह गई हैं। कृषि विभाग की योजना पर चीनी मिलों ने पानी फेर दिया है। पानी भी ऐसा कि अधिक उत्पादन की बात तो दूर, अबकी गेहूं के दाने-दाने को लोग तरसते नजर आएंगे। ऐसे में अब किसान यदि गन्ने से थोड़ा-बहुत प्राप्त भी करते वह गेहूँ के खरीद में गवाँ देना है। किसान नंगा का नंगा ही रहेगा और अखिलेश सरकार के योजनाओं का फायदा सिर्फ मिल मालिकों और सत्ता के दलालों को ही होगा।

कोई मंदिर कि लहर बना रहा है तो कोई मस्ज़िद की! कोई आरक्षण को तूल दे रहा है तो कोई जातिवाद को! हर कोई एक समाज विशेष के पीछे पड़ा है। ऐसा लग रहा है कि समस्त राजनैतिक दलों ने कोई गुप्त समझौता कर रखा है कि तुम हिन्दू को ले लो, मै मुस्लिम को, तुम दलित को ले लो, मै सवर्ण को! ब्राह्मण-बनिया, क्षत्रिय-पठान इत्यादि पर समस्त पार्टियों का,'बाँटों और राज करो' का नजरिया कायम है। भारत के हर कोने से जाकर अयोध्या में मंदिर-मस्ज़िद-शौचालय इत्यादि बनाने को सब बेक़रार हैं लेकिन वहाँ के फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, बहराइच इत्यादि जिले में जूझ रहे किसानों की किसी को नहीं पड़ी। यहाँ कि लचर स्वस्थ-शिक्षा व्यवस्था, मार्ग-परिवाहन, उद्योग विहीनता, हजारों की तादात में मजदूरी के लिए घर छोड़ते लोग इत्यादि मुद्दे नहीं हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समुचित समुदाय को समर्पित मुद्दे चुनावी परिपेक्ष्य से लगभग नदारद हैं और उनके जगह समस्त राजनैतिक दल सिर्फ मासूम किसानों को ठगने के लिए बेबुनियादी लहर का ताना-बाना बुन रहे हैं।

Saturday, 30 November 2013

भारत की नई चुनौती

बिसात के मोहरे


ईरान के साथ अमेरिका एवं अन्य पाँच शक्तियों के साथ हुए समझौते ने फिर बार साबित कर दिया कि अमेरिका ही खिलाडी है बाकि सब उसके बिसात पर बिछे मोहरे! इस समझौते ने फिर एक बार भारत के कूटनीति और दीर्घदर्शीय सोच पर सवालिया निशान लगा दिया है। अगर मौका रहते भारत ने इस मौके को पहचाना होता तो शायद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अपनी नींव रखने में कामयाब हो जाता लेकिन जिस तरह से भारत ने अमेरिकी मार्गदर्शन का पालन किया उससे सिर्फ उसकी हैसियत फिर एक बार पिछलग्गू तक ही सीमित होकर रह गई। इस वक्त के बदलते वैश्विक परिदृश्य को देखा जाये तो महाशक्तियाँ नहीं वरन ईरान, इजराइल, सीरिया जैसे देश ही वैश्विक राजनीति-व्यापारनीति का समीकरण रच रही हैं और भारत लगातार इस नीति को समझने में थाप खा रहा है।

सीरिया के मुद्दे में तटस्थता और ईरान के मुद्दे में अमेरिकीय समर्थित व्यवहार ने इसे केंद्र से परे धकेल दिया वरन शायद रुख अख्तियार का जिम्मा ईरान नहीं, भारत निभाता। इसमे कोई शक नहीं है भारत को फायदा अब भी होगा! इस समझौते से भारत को चहुँमुखी फायदा होगा, लेकिन वह तेहरान के प्रसादपर्यन्त होगा।

भारत को अब ईरानी रिश्ते को लेकर जरुरत से ज्यादा सजग हो जाना चाहिए क्योंकि अब की गयी गलती शायद अनिश्चित काल भारत को फिर मौका ना देगा। हालाँकि ईरान के उप-विदेश मंत्री की भारत यात्रा को एक शुभ संकेत समझा जा सकता लेकिन मौके को गम्भीरता से लेना होगा। अगर भारत ने मौके के नज़ाकत को भाँपकर ज़रा भी प्रतिबद्धता वर्ती तो  भारत के लिए ईरान से सम्बन्ध स्थापित करने में सुगमता होगी। ईरान के बाद भारत ही ऐसा देश है जहाँ सर्वाधिक शिया मुस्लिम निवास करते हैं। सांस्कृतिक जुड़ाव भी इसकी अहम् वजह बन सकती है क्यों ना, भारत सरकार ने पूर्व में इसी सांस्कृतिक जुड़ाव के ईरानी गुहार को अनदेखा कर दिया था। लेकिन इसके उपयोग से रिश्ते  में मधुरता कि प्रबल सम्भावना है।

पाकिस्तान भी रूकावट के जगह भारत-ईरान सम्बन्ध को ईरान-पाकिस्तान-भारत परियोजना के कारण सुगमता प्रदान करेगा। पाकिस्तान जानता है, जब तक भारत इससे नहीं जुड़ता तब तक गैस सस्ती नहीं पड़ेगी। वहीं ईरान को भी पता है भारत के बिना यह परियोजना टिकाऊ नहीं होगी। भारत का जुड़ना सबके हित में है। लेकिन भारत ने जैसा किया है, उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। भारत को अब सामने से जाना पड़ेगा और कहना होगा, "वह इसमें शामिल होना चाहता है क्योंकि पश्चिमी देशों ने आपसे प्रतिबंध हटा लिए हैं।" अपने पूर्व कर्मों के कारण अब बेशर्मी तो करनी ही होगी।

व्यापारिक सम्बन्ध भारत-ईरान के रिश्ते की नींव रखने में अहम् भूमिका अदा करेंगे। भारत सरकार ने तो अपनी तेल कंपनियों पर इस बात के लिए ज़ोर डाला था कि वो वहां पर अपना काम बंद करें। यह तो कंपनियों की समझदारी थी कि उन्होंने अपने प्रोजेक्ट बंद नहीं किए. उनको सक्रिय रखा, जिससे आज वे वापस जा सकती हैं। और भारत को भी सम्बन्ध में सुधारने में एक आसानी होगी।

ईरान से हमारे रिश्ते बेहतर हुए, तो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारतीय पहुंच आसान होगी, आगामी वर्ष काबुल से अमेरिकी फौज अपनी वापसी के लिए तैयार है ऐसे हालत में यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। अब चूक भरी नुकसान करेगा।

व्यक्ति बनाम व्यक्तित्व


व्यक्ति और व्यक्तित्व दो ऐसे पहलू हैं जिनके मध्य हमेशा संघर्ष देखने को मिलता है। व्यक्ति जहाँ निजी जिंदगी का घोतक है,  वहीँ व्यक्तित्व व्यवहारु जिंदगी का! व्यक्ति हमेशा दोहरी जिंदगी जीता है. एक जिंदगी में उसका व्यवहार खुद तक सिमित होता है तो दूसरे उसका समाजीकरण होता है। यह बात हर किसी पर लागू होती है, चाहे वह कार्ल मार्क्स, अल्बर्ट आइंस्टाइन, तरुण जीत तेजपाल हों या फिर कोई और! हम सबको यह बात समझनी होगी अन्यथा हम अपने प्रतिभावों को खोते जायेंगे.

21 नवंबर से पहले तक तहलका के पूर्व एडिटर इन चीफ तरुण तेजपाल पत्रकारिता की दुनिया का एक ऐसा नाम था जिसके सामने अच्छे-अच्छे बिरले पानी भरा करते थे। 30 साल लंबे करियर में तेजपाल ने कई ऐसी खबरें की हैं जिन्होंने ने समूचे सिस्टम को झकझोर दिया था खोजी पत्रकारिता की दुनिया में तेजपाल के खुलासे से सरकारें हिल गईं। लेकिन आज तेजपाल खुद एक शर्मनाक तहलका बन गए हैं।

तरुण तेजपाल, वह व्यक्तित्व है जो खोजी पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 13 साल से तहलका मचा रहा है। कई सफेदफोश चेहरों को बेनकाब किया। बेईमान नेता हों या रिश्वतखोर अफसर, सबकी रीढ़ की हड्डी कंपाने वाला ये इंसान अब खुद कठघरे में आ खड़ा हुआ है। तरुण तेजपाल ने खोजी पत्रकारिता की दुनिया में ऐसी लकीर खींची है जिसे छोटा कर पाना आसान नहीं। उसे मिटा पाना भी आसान नहीं। भले ही व्यक्तिगत जीवन में ये आरोप किसी कलंक से कम नहीं लेकिन पत्रकारिता में उनके नाम पर ऐसा कोई कलंक कभी नहीं लगा।

पिछले दिनों से यह देखने को मिल रहा है कि तेजपाल का सहारा लेकर तहलका, तहलका के सदस्य और सम्पूर्ण पत्रकारिता जगत पर निरंतर हमले हो रहे हैं. जितनों के हाथ संपादक-पत्रकारों ने जला रखे थे वे सब तेजपाल के नाम पर मरहम लगा रहे है। जो भी मन पड़े बके जा रहे हैं।

अब इन्हें कौन समझाये कि जो काम तहलका ने गत वर्षों में किया है वह सिर्फ तेजपाल का काम नहीं था। बहुत से लोगों के परिश्रम ने तहलका को सवांरा था। और मान लें, तेजपाल ने ही किया था तो भी उनके पत्रकारिता पर उंगली उठाने का किसी को कोई हक़ नहीं है। क्योंकि अपने पत्रकरिता के दौरान उन्होंने अपनी पत्रकारिता के भूमिका को बखूबी अदा किया। वे अपने निजी जिंदगी में क्या करते हैं वह अलग मुद्दा है। कुछ लोग कह सकते हैं कि उन्होंने अपने अधीन कार्य करने वाली महिला के साथ किया तो यह मुद्दा निजी न रह गया परन्तु वे यदि यदि ऐसा कुछ कहते हैं तो भी गलत है। क्योंकि शारीरिक आकर्षण एक तरुण तेजपाल नामक व्यक्ति को हो सकता है तहलका संपादक तरुण तेजपाल नामक व्यक्तित्व को नहीं।

एक संपादक कि जिंदगी खबर ही होती है और यदि वह खबर के साथ खिलवाड़ करे तो उसके पत्रकारत्व पर, व्यक्तित्व पर उंगली उठानी चाहिए ना कि किसी निजी व्यव्हार के कारण। तेजपाल ने हमेशा खबरी दुनिया को निखारा है इसलिए तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता ना ही, तहलका और पत्रकारिता जगत को। तरुण तेजपाल नामक व्यक्ति के साथ वही सुलूक होना चाहिए जो कानून की नज़रों में उचित हो लेकिन तरुण तेजपाल नामक संपादक को क्षति नहीं पहुँचनी चाहिए। ना ही पत्र, पत्रकारिता और किसी संपादक पर, किसी को उंगली उठाने का हक़ है।