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दिसंबर 2015 का दिन था, पीएम मोदी रूस से सीधे पहुंचे अफगानिस्तान की
राजधानी काबुल, उनकी नई संसद में अटल ब्लॉक का उदघाटन किया और अफगानिस्तान
की संसद को सम्बोधित किया। उसके बाद मोदी सीधे पहुंच गए पाकिस्तान। इतिहास
में ये तारीख हमेशा के लिए दर्ज हो गई है कि कैसे भारत का पीएम पाकिस्तान
के पीएम की सालगिरह मनाने अचानक से उड़कर पाकिस्तान पहुंच जाता है। दोनों
देशों की मीडिया के लिए ही नहीं दुनियाभर की मीडिया के लिए ये बड़ी खबर थी,
लेकिन इस बड़ी खबर में ऐतिहासिक नजरिए से एक बहुत बड़ी खबर बताने से देश
की मीडिया चूक गई और वो ये कि जिस व्यक्ति ने एक बार लोकसभा चुनावों में
भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को करारी शिकस्त दी थी,
भाजपा के दूसरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काबुल की संसद में उस व्यक्ति
की दिल खोलकर जमकर तारीफ की।
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| new Afghanistan parliament building |
कौन
था वो व्यक्ति, जिसने मोदी को काबुल की संसद में अपनी तारीफ करने पर मजबूर
कर दिया? ये व्यक्ति था उत्तर प्रदेश के
जिला हाथरस का राजा महेंद्र प्रताप सिंह। आमतौर पर हाथरस जिले का भारत के
नक्शे पर कोई बहुत महत्वपूर्ण स्थान नहीं बन पाया, आम आदमी उसे काका हाथरसी
की नगरी के तौर पर जानता है, या हींग, घी, रंग, रबड़ी जैसे कुछ उम्दा
प्रोडक्ट्स केन्द्र के तौर पर जानते हैं। उसकी वजह भी इतिहासकारों की
नाइंसाफी है, इस इंटरनेशनल क्रांतिकारी का कद कई मायनों में गांधी और बोस
के करीब है, ये वो व्यक्ति है जिसने देश के भावी पीएम को चुनावों में धूल
चटा दी, ये वो क्रांतिकारी है जिसने 28 साल पहले वो काम कर दिया, जो नेताजी
बोस ने 1943 में आकर किया। ये वो व्यक्ति है, जिसे गांधी की तरह ही नोबेल
पुरस्कार के लिए नोमीनेट किया गया और उन दोनों ही सालों में नोबेल पुरस्कार
का ऐलान नहीं हुआ और पुरस्कार राशि स्पेशल फंड में बांट दी गई।
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| King Mahendra Pratap Singh 1886-1979 |
राजा
महेन्द्र प्रताप का सही से आकलन इतिहासकारों ने किया होता तो आज राजा को
ही नहीं दुनियां हाथरस जिले को और उनकी रियासत मुरसान को भी उसी तरह से
जानती, जैसे बाकी महापुरुषों के शहरों को जाना जाता है। आखिर कोई तो बात थी
राजा में कि पीएम मोदी ने उदघाटन तो काबुल की संसद में अटल ब्लॉक का किया
और तारीफ राजा महेंद्र प्रताप की, वो भी तब जब राजा खुद को मार्क्सवादी
कहते थे यानी वामपंथी जो आरएसएस के सबसे बड़े विरोधी माने जाते हैं, लेनिन
ने उनके क्रांतिकारों विचारों से प्रभावित होकर उन्हें रूस मिलने बुलाया था
और राजा को अपनी जो किताब उपहार में दी, उसे वो पहले ही पढ़ चुके थे,
टॉलस्टॉयवाद।
पहले
ये जानिए पीएम मोदी ने काबुल की संसद में क्या स्पीच दी थी, मोदी ने कहा
था, “Indians remember the support of Afghans for our freedom struggle;
the contribution of Khan Abdul Gaffar Khan, revered as Frontier Gandhi;
and, the important footnote of that history, when, exactly hundred years
ago, the first Indian Government-in-Exile was formed in Kabul by
Maharaja Mahendra Pratap and Maulana Barkatullah.King Amanullah once
told the Maharaja that so long as India was not free, Afghanistan was
not free in the right sense. Honourable Members, This is the spirit of
brotherhood between us”।
फ्रंटियर या सीमांत गांधी को जानने वाले आज लाखों
मिल जाएंगे, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप का नाम कितने लोग जानते हैं, मोदी
ने सीमांत गांधी के साथ राजा महेंद्र प्रताप का नाम लिया और उनके और
अफगानिस्तान के किंग के बीच की बातचीत को भाईचारे की भावना का प्रतीक
बताया।
महेंद्र
प्रताप शुरू से ही आम शाही नवयुवकों की तरह नहीं थे, उनके पास मौका था कि
वो भी राजाओं को बने संघ में शामिल होकर अंग्रेजों से अपने लिए बेहतर
सुविधाओं की मांग करते और खुश रहते, लेकिन वो उनमें से नहीं थे। उनकी पढाई
मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज, अलीगढ में हुई। जो आज अलीगढ़ मुस्लिम
यूनिवर्सिटी के तौर पर जाना जाता है। शुरू से ही इंटरनेशनल सोच से उनके अंदर
क्रांति की लहरें हिलोरे मारने लगीं। 1905 के स्वदेसी आंदोलन से वो इतना
प्रभावित हुए कि अपने ससुर के मना करने के बावजूद वो 1906 के कांग्रेस के
कोलकाता अधिवेशन में हिस्सा लेने चले गए। मार्क्सवादी होने के बावजूद उनको
कांग्रेस के हिंदूवादी नेता बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल पसंद आते
थे। 1902 में ही जींद की सिख राजकुमारी से उनकी शादी हो गई।
लेकिन
उनके अंतरमन की आग आसानी से बुझने वाली नहीं थी। एक बार तो छुआछूत के
खिलाफ लोगों को साथ लाने के लिए उन्होंने अलमोड़ा में वहां की निम्न जाति
के परिवार के घर में खाना खाया तो आगरा में एक मेहतर परिवार के साथ खाना
खाया। 19 वीं सदी के पहले दशक में एक जाट और राजा के परिवार में कोई ऐसा
सोचने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था। फिर विदेशी वस्त्रों के खिलाफ अपनी
रियासत में जबरदस्त अभियान चलाया।
बाद
में उनको लगा कि देश में रहकर कुछ नहीं हो सकता। लाला हरदयाल,
वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, रास बिहारी बोस, श्याम जी कृष्ण वर्मा अलग अलग
देशों से ब्रिटिश सरकार की गुलामी के खिलाफ उस वक्त भारत के लिए अभियान चला
रहे थे। उस वक्त तक जर्मनी में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी बर्लिन कमेटी
बना चुके थे, प्रथम विश्वयुद्ध को वो एक मौका मान रहे थे, जब इंग्लैंड की
विरोधी शक्तियों से हाथ मिलाकर भारत को गुलामी से मुक्ति दिलाई जा सके।
राजा महेंद्र का नाम तब तक इतना हो चुका था कि स्विटजरलैंड में उनकी
मौजूदगी की भनक लगते ही चट्टोपाध्याय ने लाला हरदयाल और श्याम जी कृष्ण
वर्मा को उन्हें बर्लिन बुलाने को कहा, बाकायदा जर्मनी के विदेश मंत्रालय
से कहा गया उन्हें बुलाने को। लेकिन राजा ने खुद जर्मनी के किंग से
व्यक्तिगत तौर पर मिलने की इच्छा जताई, इधर जर्मनी के राजा भी उनसे मिलना
चाहते थे। जर्मनी के राजा ने उन्हें ऑर्डर ऑफ दी रैड ईगल की उपाधि से
सम्मानित किया। राजा जींद के दामाद थे और अफगानिस्तान की सीमा से भारत में
घुसने के लिए पंजाब की फुलकियां स्टेट्स जींद, नाभा और पटियाला की रणनीतिक
पोजीशन की उनसे चर्चा की। जर्मन राजा से काफी भरोसा पाकर वो बर्लिन से चले
आए। बर्लिन छोड़ने से पहले उन्होंने पोलैंड बॉर्डर पर सेना के कैम्प में
रहकर युद्ध की तैयारियों की ट्रेनिंग भी ली। उसके बाद वो स्विटजरलैंड,
टर्की, इजिप्ट में वहां के शासकों से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सपोर्ट मांगने
गए। उसके बाद अफगानिस्तान पहुंचे। उन्हें लगा कि यहां रहकर वो भारत के
सबसे करीब होंगे और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जंग यहां रहकर लड़ी जा सकती है।
आप जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि उस वक्त जब वो कई देश के राजाओं से अपने
देश की आजादी के लिए मिल रहे थे। उनकी उम्र महज 28 साल थी और अगले 32 साल
वो दुनियां भर की खाक ही छानते रहे..... दरबदर।
एक
दिसम्बर 1915 का दिन था, राजा महेंद्र प्रताप का जन्मदिन, उस दिन वो 28
साल के हुए थे। उन्होंने भारत से बाहर देश की पहली अनिर्वासित सरकार का गठन
किया, बाद में सुभाष चंद्र बोस ने सही 28 साल बाद उन्हीं की तरह आजाद हिंद
सरकार का गठन सिंगापुर में किया था। राजा महेंद्र प्रताप को उस सरकार का
राष्ट्रपति बनाया गया यानी राज्य प्रमुख। मौलवी बरकतुल्लाह को राजा का
प्रधानमंत्री घोषित किया गया और अबैदुल्लाह सिंधी को गृहमंत्री। भोपाल के
रहने वाले बरकतुल्लाह के नाम पर बाद में भोपाल में बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी
खोली गई। राजा की इस काबुल सरकार ने बाकायदा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जेहाद
का नारा दिया। लेकिन उस वक्त ना कोई बेहतर सैन्य रणनीति थी और ना ही उन्हें
इस रिवोल्यूशरी आइडिया के लिए बोस जैसा समर्थन मिला और सरकार प्रतीकात्मक
रह गई, लेकिन राजा की लड़ाई थमी नहीं। उनकी जिंदगी तो हंगामाखेज थी।
दिलचस्प बात ये थी कि जिस साल में राजा ने भारत की पहली अनिर्वासित सरकार
बनाई, उस साल गांधीजी साउथ अफ्रीका से भारत वापस लौटे थे और प्रथम विश्व
युद्ध के लिए भारतीयों को ब्रिटिश सेना में भर्ती करवा रहे थे, उन्हें
भर्ती करने वाला सार्जेन्ट तक कहा गया था।
राजा
के सर पर ब्रिटिश सरकार ने इनाम रख दिया। रियासत अपने कब्जे में ले ली, और
राजा को भगोड़ा घोषित कर दिया। राजा ने काफी परेशानी के दिन झेले। फिर
उन्होंने जापान में जाकर एक मैगजीन शुरू की, जिसका नाम था वर्ल्ड फेडरेशन।
लम्बे समय तक इस मैगजीन के जरिए दुनियाभर के सामने ब्रिटिश सरकार की
क्रूरताओं को सामने लाते रहे। फिर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राजा ने फिर
एक एक्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया, ताकि ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने के लिए
मजूबर किया जा सके, लेकिन युद्ध खत्म होते होते सरकार राजा की तरफ नरम हो
गई थी, फिर आजादी होना भी तय मानी जाने लगी। राजा को भारत आने की इजाजत
मिली। उसके ठीक 32 साल बाद राजा भारत आए। 1946 में राजा मद्रास के समुद्र
तट पर उतरे। वहां से वो घर नहीं जाकर सीधे वर्धा पहुंचे गांधी जी से मिलने।
गांधीजी
और राजा में अजीबोगरीब रिश्ता था, बहुत कम लोगों को पता होगा कि हाथरस के
इस राजा को नोबेल पुरस्कार के लिए नोमीनेट किया गया था और एक तय वक्त के
बाद नोबेल कमेटी के कमेंट्स को सार्वजनिक कर दिया जाता है।
राजा के बारे
में नोबेल कमेटी ने उस वक्त किया लिखा था ये पढ़िए, "Pratap gave up his
property for educational purposes, and he established a technical
college at Brindaban. In 1913 he took part in Gandhi's campaign in South
Africa. He travelled around the world to create awareness about the
situation in Afghanistan and India. In 1925 he went on a mission to
Tibet and met the Dalai Lama. He was primarily on an unofficial economic
mission on behalf of Afghanistan, but he also wanted to expose the
British brutalities in India. He called himself the servant of the
powerless and weak."।
सबसे
खास बात थी कि नोबेल पुरस्कार समिति की इन्ही लाइनों से ये पता चला कि वो
गांधी जी के साउथ अफ्रीका वाले आंदोलन में भी हिस्सा लेने जा पहुंचे थे।
इतना ही नहीं वो तिब्बत मिशन पर दलाई लामा से भी मिले थे। उस साल किसी को भी नोबेल पुरस्कार नहीं
दिया गया, सारी पुरस्कार राशि किसी स्पेशल फंड में दे दी गई। इसका गांधी
कनेक्शन ये है कि बिलकुल ऐसा ही तब हुआ था, जब गांधीजी को 1948 में नोबेल
पुरस्कार के लिए नोमिनेट किया गया था, गांधीजी की हत्या होने के चलते बात
आगे नहीं बढ़ी और उस साल भी नोबेल पुरस्कार के लिए किसी के नाम का ऐलान
नहीं हुआ। सारा पैसा स्पेशल फंड में दे दिया गया।
नोबेल
पुरस्कार समिति के कमेंट्स से ही पता चलता है कि गांधी जी ने एक बार राजा
महेंद्र प्रताप की अपने अखबार यंग इंडिया में जमकर तारीफ की थी, गांधीजी ने
लिखा था, “"For the sake of the country this nobleman has chosen exile
as his lot. He has given up his splendid property...for educational
purposes. Prem Mahavidyalaya...is his creation," ।
गांधीजी
से उनका गहरे नाते की मिसाल देखिए, 32 साल बाद भारत आए तो सीधे उनसे मिलने
जा पहुंचे, मद्रास से सीधे वर्धा। बावजूद इसके वो कांग्रेस में शामिल नहीं
हुए, लेकिन उनकी हस्ती इस कदर बड़ी थी कि कांग्रेस तो कांग्रेस उस वक्त के
जनसंघ के बड़े नेता और भावी पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को भी लोकसभा के
चुनावों में धूल चटा दी। वो 1952 में मथुरा से निर्दलीय सांसद बने और 1957
में फिर से अटल बिहारी वाजपेयी को हराकर निर्दलीय ही सांसद चुने गए। बिना
किसी का अहसान लिए शान से राजा की तरह जीते रहे।
राजा
महेंद्र प्रताप की उपलब्धियां यहीं कम नहीं होतीं, उनके खाते में भारत का
पहला पॉलीटेक्निक कॉलेज भी है। अपने बेटे का नाम रखा उन्होंने प्रेम और
वृंदावन में एक पॉलीटेक्निक कॉलेज खोला, जिसका नाम रखा प्रेम महाविद्यालय।
राजा मॉर्डन एजुकेशन के हिमायती थे, तभी एएमयू के लिए भी जमीन दान कर दी।
देश की आजादी के बाद लोग मानते थे कि उनसे बेहतर कोई विदेश मंत्री नहीं हो
सकता था, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ मांगा नहीं और आम जन के लिए काम करते
रहे। पंचायत राज कानूनों, किसानों और फ्रीडम फाइटर्स के लिए लड़ते रहे।
मोदी
ने अचानक से यूं ही उनका नाम नहीं लिया, अफगानिस्तान और भारत के सम्बंधों
पर रिसर्च हुई होगी तो सबसे कद्दावर नाम इतिहास से राजा महेंद्र प्रताप का
निकला होगी।
पिछले कुछ सालों से अलीगढ़ के स्थानीय बीजेपी नेता एएमयू में राजा महेंद्र
प्रताप के एएमयू में योगदान के चलते कैम्पस में उनकी जयंती मनाने को लेकर
कोशिश करते आ रहे हैं, जो किसी का नहीं है, वो संघ का है। वैसे भी राजा के
दामन में कोई दाग नहीं है और राजा को वो नहीं मिला, जिसके वो वाकई में
हकदार थे। सबसे बड़ी बात ये कि उनके अपने शहर हाथरस में उन्हें जानने वाले
युवा ढूंढे नहीं मिलेंगे। उनकी मौत के बाद सरकार ने उसी साल एक डाक टिकट
जारी करके इतिश्री कर दी। लेकिन क्या उनके कामों और योगदान को देखते हुए
क्या वाकई में इंसाफ हुआ उनके साथ?
राजा महेंद्र प्रताप भी
उन्हीं तमाम चेहरों में से हैं, जिनका आजादी के बाद इतिहासकारों ने सही
ढंग से मूल्यांकन नहीं किया। दुनिया भले ही नोबेल के लायक उनको मान ले,
लेकिन सरकार उनकी जयंती तक मनाने लायक नहीं समझती आईं और ये नाइंसाफी की
मार केवल राजा महेंद्र प्रताप ने ही नहीं भुगती, उनके जिले हाथरस ने भी
भुगती है।
Source: IBN7




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