Friday, 12 February 2016

नाम बड़े और दर्शन खोटे

300 मिलियन डॉलर का टर्नओवर करते चिरीपाल ग्रूप का शैक्षणिक घोटाला, एसबीएस मे फर्जीवाडा 





चिरीपाल ग्रूप द्वारा संचालित शांति बिजिनेस स्कूल(एसबीएस) मे दिया जाता बैचलर ऑफ कॉमर्स(बीबीए) की  यूजीसी द्वारा मान्य नही है. अहमदाबाद के टॉप बिजिनेस स्कूल मे शामिल एसबीएस, डाइरेक्टर अरबिंद सिन्हा के मुताबिक, छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर की डा. सी.वी. रमन यूनिवर्सिटी से संग्लन है. डा. सी.वी. रमन यूनिवर्सिटी एक निजी संस्था है. यूजीसी के अनुसार  यूनिवर्सिटी के पास संलग्नता देने का अधिकार ही नही है. ऐसे मे एसबीएस द्वारा किया गया बीबीए सिर्फ एक टाइमपास है.

क्या है मामला
शहर के नामी इन्डीस्ट्रियालिस्ट वेदप्रकाश चिरीपाल के द्वारा संचालित एसबीएस को गुजरात के टॉप बिजिनेस स्कूल में एक माना जाता है. 3.45 लाख फीस और फाइव स्टार सुविधाओं से लैस इस स्कूल को 2010 मे चिरीपाल ग्रूप द्वारा शुरु किया गया. इस कॉलेज मे डिग्री और डिप्लोमा दो तरह के कोर्स पढ़ाये जाते है. डिग्री कोर्स मे बीबीए कराया जाता है वही पोस्ट ग्रेजुएट मे डिप्लोमा कराया जाता है. इसमे  बीबीए फर्जी है.

कैसे फर्जी है बीबीए कोर्स?
डिप्लोमा के लिये मान्यता नही चाहिये लेकिन डिग्री के लिये किसी भी कॉलेज को यूजीसी से मान्यता प्राप्त करना होता है अथवा यूजीसी अधिकारिक यूनिवर्सिटी से संलग्नता लेना पड़ता है. फिर वही यूनिवर्सिटी संलग्न कॉलेज के समस्त छात्रों को डिग्री प्रदान करती है. लेकिन कहे अनुसार बीबीए की डिग्री देने के लिये एसबीएस जिस डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी छत्तीसगढ़ से संलग्न है वह किसी भी ऑफ सेंटर(राज्य से बाहर) संस्था को संलग्नता देने की अधिकारिक नही है.

डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी कैसे अधिकारिक नही है?
यूजीसी के अनुसार निजी यूनिवर्सिटी किसी भी संस्था, कॉलेज को संलग्नता नही दे सकती. वे अपने राज्य के बाहर कोई सेंटर्स नही शुरु कर सकती. यदि उनको राज्य के बाहर सेंटर्स शुरु करना है तो पहले अपने राज्य में पांच साल पूरा करें. पांच साल पूरा हो जाने पर यूजीसी को अन्य राज्य में सेंटर्स शुरु करने के लिये सूचित करें. फिर यूजीसी से अनुमोदन मिलने के बाद अन्य राज्य मे अपना सेंटर्स शुरु कर सकते हैं. लेकिन अभी तक यूजीसी ने किसी भी निजी यूनिवर्सिटी को अन्य राज्य में सेंटर्स शुरु करने का अनुमोदन नहीं दिया है.
यूजीसी द्वारा एक सार्वजनिक सूचना भी निजी यूनिवर्सिटीस को दिया गया है. जिसमें यूजीसी ने कहा है,"ऐसा जानने को मिला है कि कुछ निजी यूनिवर्सिटीस कॉलेज को मान्यता दे कर ऑफ सेंटर्स शुरु कर रहें हैं. यह यूजीसी के अधिनियम(एस्टॅब्लिशमेंट ऑफ एंड मेंटेनेन्स ऑफ स्टॅंडर्ड्स इन प्राइवेट यूनिवर्सिटीस) 2003 का उल्लंघन और प्रो. यश पाल एवम् अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवम् अन्य के मामले मे माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले का उल्लंघन है.
इस सार्वजनिक सूचना के साथ यूजीसी ने 234 यूनिवर्सिटीस का नाम भी दिया है जो किसी भी कॉलेज-ऑफ सेंटर्स को संलग्नता नहीं प्रदान कर सकती. इसमें डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी का नाम भी आता है.

क्या कह रहे एसबीएस डाइरेक्टर?
डाइरेक्टर अरबिंद सिन्हा के साथ जब इस बारे में फोन काल किया गया तो उन्होने कहा, "हमारी संलग्नता के साथ है लेकिन इस बारे में मुझे और अधिक जानकारी नही है." वहीं इस बारे में अधिक जानकारी के लिये हयर एज्युकेशन कमिश्नर ए. जे. शाह से संपर्क स्थापित करने की कोशिश नाकामयाब रही.

क्या कह रहे डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी के कुलसचिव?
संदेश डॉट काम ने जब इस बारे मे डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी, छत्तीसगढ़  के कुलसचिव शैलेश पाण्डेय से बात की तो उन्होने इस प्रकार के किसी भी संलग्नता से इंकार किया. बकौल कुलसचिव," हमारा छत्तीसगढ़ के बाहर कोई सेंटर नही है. अगर ऐसा कुछ कोई बोल रहा तो वह फर्जी है."


क्या हो सकता है?
यूजीसी द्वारा जारी उपरोक्त नियमानों के अनुसार डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी से संलग्नता एवम् एसबीएस से बीबीए सिर्फ एक शैक्षणिक घपलेबाजी बन के रह जाता है. उसपर यूनिवर्सिटी के कुलसचिव के बयान ने बाकी बचे, एसबीएस के बचाव के मौके पर भी गतिरोध लगा दिया है. अब यूजीसी या तो अपने नियमन मे बदलाव लाये या फिर एसबीएस से बीबीए कर रहे बच्चों की डिग्री सिर्फ एक रद्दी कागज रह जायेगी.

क्या होना चाहिये?
यूजीसी को इस मामले पर संज्ञान लेना चाहिये. इस पर एक कमिटी गठित कर के दोषिए तुरंत इस पर कार्रवाई करनी चाहिये. वही जो 100 के आस-पास बच्चे यहाँ से पढ रहे हैं, कुछ फाइनल ईयर मे है, उनके लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था करना चाहिये! क्योंकि संस्थाओं का दोष हो सकता है इसमें लेकिन बच्चों को का तो नहीं है. जिन्होने लाखो रुपये खर्च करके यहाँ से पढ़ाई की है सबका भविष्य लाखो खर्च करने के बाद अंधेरे मे है.

Published: http://www.sandesh.com/article.aspx?newsid=3229930

Tuesday, 2 February 2016

‘‘नाकामी का जीता-जागता स्मारक" पर क्यों बज रही ताली: मनरेगा


10 साल मनरेगा के
आज महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के 10 साल पूरे हो रहे गए। पहले ‘मनरेगा’ के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने वाली मोदी सरकार ने मंगलवार को इस योजना की तारीफ करते हुए कहा कि एक दशक की इसकी उपलब्धि राष्ट्रीय गर्व और उत्सव का विषय है।

यह योजना 2 फ़रवरी 2006 को 200 जिलों में शुरू की गई, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में विस्तारित किया गया और 1 अप्रैल 2008 तक अंततः भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। 2006-2007 में परिव्यय 110 बीलियन रुपए था, जो 2009-2010 में तेज़ी से बढ़ते हुए 391 बीलियन (पिछले 2008-2009 बजट की तुलना में राशि में 140% वृद्धि) रूपए हो गया। इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद से इस पर 313844 करोड़ रूपये खर्च हुआ जिसमें से 71 प्रतिशत मजदूरी का भुगतान करने में किया गया। इसके तहत 20 प्रतिशत कार्य अनुसूचित जाति वर्ग के मजदूरों और 17 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वर्ग के मजदूरों को प्रदान किया गया ।  2008-09 के दौरान 4,49,40,870 ग्रामीण परिवारों को मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराया गया


महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जिसे 25 अगस्त 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया गया।  बेल्जियम में जन्मे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में कार्यरत् अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की इस परियोजना के पीछे एक अहम भूमिका है। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है जो प्रतिदिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से पिछली यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ की तारीफ करने पर कांग्रेस ने कहा कि  देर आए दुरूस्त आए। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार ‘मनरेगा’ का मखौल उड़ाते हुए कहा था कि यह पिछले 60 सालों में गरीबी नहीं मिटा पाई कांग्रेस की ‘‘नाकामी का जीता-जागता स्मारक है।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भाजपा और मोदी सरकार के बदलते रवैया पर कहा कि देर आए दुरूस्त आए । अगर कोई कुछ अच्छी बात कहता है तो इसकी तारीफ करने की जरूरत है। यह दिखाता है कि इस अहम कानून से कैसे ग्रामीण गरीबों की जिंदगी में बदलाव लाने का काम किया।


अब मेरी बात-
मोदी ने एक समय इसी योजना को कांग्रेस के नाकामयाबी का स्मारक बताय था. आज वे ही इसकी तारीफ कर रहे. क्यों कर रहे तारीफ साहब? क्या इस देश के लोगो का पेट डिजिटल इंडिया से नहीं भरा जो आपको भी अब मनरेगा रास आने लगा है? या फिर जो आपने सपनों के हवाई किले खड़े किये थे वे ढहते महसूस हो रहे, जो अब मनरेगा भाने लगा है. साहब जुबान चलाना आसान है भूखी जनता के पेट की रोटी चलाना बहुत मुश्किल. मैं जनता हूँ साहब आप गलत नहीं हो, आप इस देश को सवांरने के लिए अपना जी जान दे रहे हो लेकिन साहब कल वालों ने उतने भी पाप नहीं किये थे, जो आपने उन्हें कंस बना दिया.

मुझे नहीं चाहिए मनरेगा साहब. आई लव डिजिटल इंडिया, आई लव आईफोन, आई लव मैक, आई लव शॉप ओन डिजिटल प्लेटफार्म फ्रॉम माय इतालियन फर्निश बैडरूम, बट बिफोर आल ऑफ़ इट, आई नीड ब्रेड! 80% से ज्यादा देश बेरोजगार अथवा जरुरत से काम आय से पीड़ित है, उसे रोटी चाहिए. पहले उसको दो जून की रोटी चाहिए फिर बुलेट ट्रैन और आईफोन .

नोट- कांग्रेस में तुम्हें सबसे नकारी और आलसी सरकार मानता हूँ.

किसान को सिर्फ सब्सिडी की बैसाखी नहीं , सरकार के सक्रिय समर्थन की जरूरत है.





पिछले अनेक वर्षों से महाराष्ट्र में विदर्भ ही नहीं, देश के कई अन्य भागों में फसल खराब होने के कारण कर्ज चुकाने में अक्षम किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं करते आ रहे हैं. केन्द्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012, 2013 एवं 2014 में कृषि से जुड़े कारणों ने 3313 किसानों को आत्महत्या करने पर विवश किया. इनमें से 3301 आत्महत्याएं केवल पांच राज्यों, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में हुईं. 1999 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और 2010 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने किसानों को सुरक्षा देने की दृष्टि से फसल बीमा योजना लागू की थी लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है. इससे निश्चय ही किसानों को खराब फसल होने की स्थिति में काफी राहत मिलेगी.

योजना में यह प्रावधान है कि किसान अपनी फसल का जितनी रकम का बीमा करा रहा है, उसके लिए दिये जाने वाले प्रीमियम का रबी की फसल के लिए सिर्फ 1.5 प्रतिशत और खरीफ की फसल के लिए केवल दो प्रतिशत प्रीमियम ही देगा. शेष प्रीमियम सरकार अदा करेगी. लेकिन फसल खराब होने की स्थिति में उसे बीमे की पूरी रकम क्लेम में मिल सकेगी. सरकार को आशा है कि लगभग 50 प्रतिशत किसान इस योजना का लाभ उठा पाएंगे. अनुमान है कि प्रतिवर्ष इस पर सरकारी कोष से साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये दिए जाएंगे.
यह योजना ऐसे समय में आई है जब लोग यह जान कर चौंक पड़े हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने उद्योगपतियों का एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज माफ कर दिया है. ऐसे में यदि किसान छोटी-छोटी रकम के लिए आत्महत्याएं कर रहे हैं तो इससे जनता में आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है. इस स्थिति को टालने के लिए मोदी सरकार ने फसल बीमा योजना घोषित की है. निकट भविष्य में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. जाहिर है कि योजना की घोषणा उन्हें ध्यान में रखकर की गई है. लेकिन लोकतंत्र में ऐसा होना स्वाभाविक है और इससे योजना के लाभकारी चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. उम्मीद यही है कि, जैसा कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है, इस योजना से किसानों को एक सुरक्षा कवच मिलेगा.



लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कृषि क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है क्योंकि कृषि करना अब लाभ का काम नहीं रह गया है. पिछली सभी सरकारों ने और वर्तमान सरकार ने भी कृषि क्षेत्र में निवेश करने से गुरेज किया है और अपना पूरा ध्यान उद्योग को समर्थन देने पर केन्द्रित किया है. इसलिए अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व और भूमिका भी घटते गए हैं और अनेक कृषि उत्पादों के लिए हमारी आयात पर निर्भरता बढ़ती गई है. यदि वर्तमान केंद्र सरकार इस ओर भी ध्यान दे और इस असंतुलन को ठीक करे, तो वह कृषि के लिए दूरगामी महत्व का कदम होगा. किसान को सिर्फ सब्सिडी की बैसाखी की जरूरत नहीं है, उसे अपना कृषिकर्म सुचारू रूप से कर पाने के लिए सरकार के सक्रिय समर्थन की जरूरत है.