Friday, 30 September 2016

कर दो मुझे भी देश द्रोही घोषित


आज देश में वह दौर चल रहा है कि हर किसी को सर्टिफिकेट में कैद किया जा रहा है. आप आरएसएस के विचारों को नहीं मानाते तो आप देशद्रोही हो, केजरीवाल के  नहीं तो बेईमान हो, कांग्रेस के नहीं तो सांप्रदायिक हो. सीधा सा फंडा है कि आप मेरे नहीं तो उसके हो. कुल मिलकर सुनने में अच्छा लगे ऐसे एक शब्द को पकड़ कर हर पार्टी ने अपना ट्रेडमार्क कर लिया है. फिर क्यों ना उस पार्टी का उस शब्द के विचारधाराओं से नहाने-निचोने के भी ताल्लुक ना हो.
अभी देश में राष्ट्रवाद की हवा जोरो पर है. इस राष्ट्रवाद नाम की चिड़िया का ट्रेडमार्क इस देश के माननीय  दलितपुत्र, माँ के लाडले, आरएसएस कैडर प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के नाम है. जो मोदी का है वही राष्ट्रवादी है बाकि सब देशद्रोही. मोदी मतलब राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद मतलब मोदी. मोदी मतलब राष्ट्र, राष्ट्र मतलब मोदी. राष्ट्र मतलब भारत, भारत मतलब मोदी. इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा!
आज कल राष्ट्रवादी और देशद्रोही का तमगे थोक के भाव में बिक रहा है. हालाँकि इस तमगे के जनक हमारे माननीय ईमानदार श्री श्री केजरी बाबू थे लेकिन आज कल उनके ईमानदारी के तमगे का रेट काफी शेयर बाजार की तरह लेवाली में लुढ़क गया है. अभी तो बस राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद है बिकता है. वैसे काम कांग्रेस भी नहीं है उसने भी अपने धर्मनिरपेक्षता का आईपीओ बड़े धूम-धड़ाके से लांच किया था लेकिन राहुल बाबा के कमजोर इमेज के चलते निवेशकों में कुछ खास भरोसा नहीं जमा. लेकिन फिर भी राहुल बाबा मार्केट में डेट हुए है. जबसे हनुमान गढ़ी- अयोध्या जा कर बाबा ने बजरंगबली के दर्शन "लिए" है तबसे बाबा के पौरुषत्व में जबरदस्त इजाफा हुआ है. 
हाँ तो हम क्या बात कर रहे थे...राष्ट्रवाद! राष्ट्रवाद का तमगा आज कल माननीय और गण दे रहे है. जितना ज्यादा चाहो उतना ले सकते हो. बेचने वाले लाइन लगा कर, बाजार बिछाकर तैयार है. बेचे जा रहे है. एक तरफ से सबकुछ बेचे जा रहे है. राष्ट्रवाद मय राष्ट्रवाद! फिर चाहे प्रधानमंत्री की गरिमा हो या सीमा, हमारे सिपाहियों की लाशें हो या किसी कफ़न में में लिपटे माँ के लाल! सबकुछ बेचा जा रहा है. ऐसे हालात में यदि आप कुछ बोलते हो तो आप सिर्फ बदनसीब देशद्रोही हो.
पठानकोट और उरी के बाद राष्ट्रवाद का शेयर काफी टूट गया था. बहुमत में लोग  "घर से ना जाये" इस डर से बेचने लगे थे. बाजार को लुढ़कने से बचाने लिए दलालों के नए उपनाम चारणभाट संपादकों का भी खूब उपयोग किया गया. कही सर्जिकल स्ट्राइक हुई तो कही सिंधु, चेनाब, झेलम, रावी, सतलज आदि के लाखो क्यूसेक पानी संपादक गण पी गए. लेकिन फिर भी बाजार पटरी पर नहीं आया प्रोडक्ट रिलांच हुआ. जिसे नाम दिया गया सर्जिकल स्ट्राइक!
सर्जिकल स्ट्राइक कितना सही हुआ है कितना गलत! यह तो आने वाला वक्त बताएगा क्योंकिं दावे 38  से पचास के है लेकिन अभी तक साबित सिर्फ दो का ही है. चलो दो भी है तो अच्छा है. वैसे भी मारने वाले गिनते नहीं और और गिनाने वाले मारते नहीं.
मुद्दा यह नहीं कि कितने? लेकिन जितना भी हुआ है वह सिर्फ एक मार्केट बचाने की स्ट्रैटजी है इससे ज्यादा कुछ नहीं ! यह यूपी, गुजरात, पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में गिरते मार्केट को रोकने के लिए किया गया डैमेज कंट्रोल है. यदि यह डैमेज कंट्रोल ना होता तो सरकार को इतना प्रोपेगेट करने की जरुरत ही नहीं पड़ती. आज से पहले भी सर्जिकल ऑपरेशन हुए है लेकिन किसी भी सरकार ने यों धतिंग नाच नहीं किया. 2007 और 2013 में भी आर्मी ने किया था लेकिन कितने लोगों को मालूम कि ऐसा कुछ हुआ था?
सरकार ने सीधे-सीधे अपने चुनावी एजेंडे पर 150  सैनिकों को दांव पर लगा दिया था. सरकारी भाषा में मान ले कि सैनिकों का काम है यह तो पलटवार 12 दिन पहले भी हो सकता था लेकिन सरकार को मालूम है युद्ध मतलब मंहगाई और मंहगाई यदि बढ़ी तो जिस सत्ता-शासन के लिए इतना धतिंग-नाच चल रहा है वह बेकार जाता. इसलिए सरकार युद्ध से दूर है लेकिन यदि सरकार 2018 ऐसे तक ऐसे ही सरकार मुद्दों पर फेल रहेगी और वादे बस चुनावी जुमले होंगे तो सरकार फिर युद्ध भी करेगी. क्योंकि घर बचाने का यह सबसे पुराना रास्ता है कि जब मुखिया घर को ठीक से नहीं चला पा रहा होता है तो पडोसी से झगड़ा कर लेता है.
क्यों मैं इस सर्जिकल ऑपरेशन के खिलाफ हूँ?
मेरे यह कहते ही कि मैं इस ऑपरेशन के खिलाफ हूँ जल्दी मुझे भी देशद्रोही का तमगा मिल जाने वाला है लेकिन फिर भी मैं हूँ. क्योंकि यह ऑपरेशन मैं रैंप पर सुंदरियों के कपडे गिरा देने वाले स्टंट से ज्यादा कुछ भी नहीं मानता. सरकार ने भी कपडे गिरा कर स्टंट किया है. अगर ऐसा नहीं होता तो कोई भी सरकार अपने डिफेन्स सिस्टम के मामले को पब्लिसाइज नहीं करती. करती है तो बस उतना ही कि कट टू कट समाचार जाये और देश की जनता मोटिवेट हो सके. लेकिन ऐसे नंग नाच नहीं होता.
दुसरी बात कि यदि सरकार के इरादे मजबूत होते तो ऑपरेशन बड़े स्तर पर होता पब्लिसिटी नहीं. यह थोथा चना बाजे घना वाली बात है.
तीसरी और सबसे मजबूत वजह है कि सरकार ने इतने छोटे से ऑपरेशन को इतना पब्लिसाइज़ करके देश की सुरक्षा को बड़े स्तर से नुकसान किया है. पाकिस्तानी सेना का अपने विकास के लिए लड़ने का व्यवहार नहीं है बल्कि वहां कि सेना और जनता दोनों विचारधारा से चलती है और वह विचारधारा है धार्मिक उन्माद की विचारधार. जिसे पूरे दुनिया में अपने खलीफा को स्थापित करना है. अभी तक यह  खलीफा वाली विचारधारा सिर्फ आतंकी गुटों और आर्मी के कुछ पक्षों पर ही हावी था लेकिन जब देश की संप्रभुता को खतरा हो तो समस्त नागरिको की विचारधार एक होती है. जो आतंकी मास(mass) से साइड हुए थे अब वे मेइन स्ट्रीम में आ जायेंगे. सामान्य जन उनकी भाषा बोलेगा. कितनों का सर्जिकल ऑपरेशन करोगे?

अपनी जनता नशे में डूब गई है वही दुश्मन चौकन्ना हो गया है. लो अब कर दो मुझे भी देश द्रोही घोषित!

Wednesday, 17 August 2016

डॉ. निर्मला के मंत्रित्व की चुनौती उनका पडोसी है












राज्य के नए मुख्यमंत्री विजय रूपानी के मंत्रिमंडल में इकलौती महिला मंत्री डॉ. निर्मला बेन सुनील वाघवाणी को शामिल किया गया है. डॉ. को राज्य कक्षा के मंत्री का दर्ज प्राप्त हुआ है. उन्हें महिला एवम बाल विकास का मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है. डॉ. निर्मला पेशे से गायनेक डॉक्टर हैं. राजस्थान यूनिवर्सिटी से एमएस डॉ. निर्मला, डाक्टरी के पेशे में सामान्य रही है. यह दिलचस्प है कि डॉ. को जिस मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है उसका वीभत्स चेहरा उनके घर के बगल से ही शुरू होता है. तो क्या अपने मंत्रिमंडल के चुनौती से वे निपट पाएंगी(?) यह एक बड़ा प्रश्न है.

डॉ. निर्मला जिस विस्तार से आती है उसे अहमदाबाद शहर के पिछड़े विस्तार में एक माना जाता है. महिला हों या बच्चे! दोनों के हालत बदतर हालात में हैं. कुपोषण, अशिक्षा, बाल मजदूरी, घरेलू हिंसा वहां के हर गली-मोहल्ले में आम है. ऐसी स्थिति में डॉ. को यदि सच में अपने मंत्रालय महिला एवम बाल विकास के दायित्व को जिम्मेदारी पूर्वक निभाना होगा तो उसकी शुरुवात देवी ज्योत अपार्टमेंट कुबेरनगर में स्थित उनके अस्पताल के नीचे से ही शुरू करनी पड़ेगी.

पूरे राज्य की बात तो बाद की है पहले डॉ. निर्मला को नरोडा में ही महिला एवम बाल विकास करना होगा. अगर आगामी चुनाव से पहले वे सिर्फ नरोडा में महिलाओं और बालको की स्थिति सुधर ले जाती है तो शायद रूपानी साहब के निर्णय को सही साबित कर देंगी. वैसे उनको चर्चा में मुख्यमंत्री नहीं बल्कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह द्वारा बनाया मंत्री माना जाता है लेकिन फिर भी, मंत्री तो वे रूपानी साहब के मंत्रिमंडल की  ही हैं

डॉ. निर्मला नरोडा विधानसभा से बीजेपी के सीट से विधायक है. नरोडा की पूर्व विधायक माया कोडनानी के पतन के साथ डॉ. का राजनितिक उदय हुआ लेकिन विगत वर्षों में वह सरकार के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण किनारे रही. उन्हें कभी लाइमलाइट में आने का मौका नहीं मिल सका. डॉ. को बीजेपी के अमित शाह सिंडिकेट का भरोसेपात्र बताया है.  अंदरखाने चल रहे गपशप के अनुसार आनंदीबेन के मंत्रिमंडल में जो जगह वसुबेन त्रिवेदी का था उसी जगह पर अब डॉ. निर्मला स्थापित किया जा रहा है.  


वसुबेन की जगह पर डॉ. निर्मला को  स्थापित करने की राह आसान नहीं है क्योंकि उनके अस्पताल के नीचे वाले लोगों को भी उनपर भरोसा नहीं है. उनके अनुसार डाक्टरी के पेशे में वे जिस तरह से सामान्य रह गई है वैसे ही मंत्रालय में भी होना है क्योंकि डिग्री हो या मंत्रालय आशीर्वाद से मिल तो सकता है लेकिन सफलता व्यक्तिगत काबिलियत से ही मिलती है. ऐसी स्थिति में डॉ. के लिए भविष्य में बड़ी चुनौती है.

Wednesday, 10 August 2016

अध्यक्ष की कुर्सी पर अमित शाह "ख़ासमख़ास" हैं



"बीजेपी के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ी थीकिन्तु किन्तु ख़ासमख़ास अमित शाह के आगे भला किसकी क्या मजाल?"



भारतीय जनता पार्टी में यूं तो एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता आये हैं, जिन्होंने अध्यक्ष पद की कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ रखी है, पर कहना पड़ेगा कि अमित शाह जी इन सबमें 'ख़ास' हैं! ख़ास ही क्यों, बल्कि उन्हें 'ख़ासमख़ास' कहना ज्यादा उचित होगा. कोई ये न समझ ले कि 'ख़ास और ख़ासमख़ास' का सफर इतनी आसानी से तय किया जाता है, बल्कि उसके लिए 'ख़ास' काम भी करने पड़ते हैं, जिसे राजनीतिक भाषा में 'तीर' मारना कहते हैं. अमित शाह जी के तरकश में यूं तो कई तीर भरे हैं, जिन्हें वह अक्सर मारते ही रहते हैं किन्तु हाल के दिनों में उनके दो तीरों की ख़ास चर्चा है.

पहला तीर उन्होंने गुजरात में मारा है, जहाँ अविश्वस्त सूत्रों के अनुसार कहा जा रहा है कि 'साहेब' और 'बेन' की पसंद के बावजूद अमित शाह ने गुजरात फतह की गारंटी लेकर नितिन पटेल को पीछे छोड़ा और विजय रूपाणी को कमान दिलाई. कई खबरियों ने तो यह भेद खोल दिया कि आनंदीबेन और अमित शाह के बीच बैठकों में तू-तू, मैं-मैं भी हुई. पर मूल बात यह है कि अमित शाह का तीर यहाँ निशाने पर लगा और तीर निशाने पर लगते ही अमित भाई, गुजरात छोड़कर यूपी जा पहुंचे!

यूं तो अमित शाह के तगड़े कन्धों पर पूरे देश में भाजपा की जिम्मेदारी है, किन्तु गुजरात और यूपी का तो उन्हें पूरा ठेका मिल गया है. ऐसे में गुजरात-यूपी, गुजरात-यूपी करना उनकी मजबूरी और आने वाले समय की मजबूती भी बन सकता है.

खैर, गुजरात की समस्या सुलझाने के बाद अमित शाह के निशाने पर यूपी का एक बड़ा कैच पकड़ना था और उन्होंने बीएसपी से अलग हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को बीजेपी में शामिल कराकर यह कैच सफलतापूर्वक पकड़ लिया. यूपी में चार बार विधायक रहे स्वामी प्रसाद मौर्या  हालिया दिनों में काफी चर्चित रहे, जब उन्होंने बीएसपी सुप्रीमो मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया. यूपी में भी अविश्वस्त सूत्र बताते हैं कि 'शाह' हर हाल में यूपी का जातीय गणित दुरुस्त करने में लगे हुए हैं, जहाँ अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में 8% मौर्य और कुशवाहा वोटों पर उनका यह तीर निशाने पर लग सकता है. यूपी राजनीति को समझने का अमित शाह दावा और दांव तो खूब चल रहे हैं, हालाँकि यूपी के कई नेता उनकी गुजराती स्टाइल को समझ नहीं पा रहे हैं. खबर तो यह भी है कि बीजेपी के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ी थी, किन्तु किन्तु ख़ासमख़ास अमित शाह के आगे भला किसकी क्या मजाल!

वैसे, कुछ ऐसा ही प्रयोग उन्होंने बिहार में 'मांझी' नामक कैच पकड़ कर किया था, पर तौबा-तौबा बिहार की याद कहाँ आ गयी, क्योंकि इस प्रदेश ने तो बिचार अमित शाह की 'हैट्रिक' ख़राब कर दी थी, अन्यथा हरियाणा, महाराष्ट्र के बाद…..!!

खैर, बिहार की कड़वी यादों को वह पीछे छोड़ चुके हैं और यूपी इलेक्शन में अपने 'ख़ास तीरों' से वह जीत की ओर कदम बढ़ाने में लग गए हैं.

Monday, 8 August 2016

भारत छोड़ो आंदोलन में गोरक्षा और खिलाफत एक सिक्के के दो पहलू थे

आज भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ है. और यह ऐसे नाजुक मौके पर आई है, जब देश में गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों की मरम्मत करने के बहाने खोजे जा रहे हैं. प्रधानमंत्री ने भले ही मुसलमानों पर फर्जी गोरक्षकों के हमले को अभी तक सार्वजनिकरूप से स्वीकार न किया हो, लेकिन दलितों पर जुल्म को तो उन्होंने आला दर्जे की भावुकता के साथ स्वीकार किया है. इतनी अच्छी भावुकता तो आजकल फिल्मों में भी देखने को नहीं मिलती. बहरहाल इस मौके पर महात्मा गांधी के 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में दिए भाषण की याद कर लेना चाहिए. यही वह भाषण था जिसके अंत में ‘करेंगे या मरेंगे’ का नारा निकला और अंत में आजादी की लड़ाई आजादी की चौखट तक पहुंची.

इस भाषण की शुरुआत अगर कम्युनिस्टों को फटकार के साथ हुई, तो एक बड़ा हिस्सा मुसलमानों को यह समझाने में हुआ कि यह देश सबका बराबर का देश है, लिहाजा उन्हें पाकिस्तान की नाजायज मांग का समर्थन नहीं करना चाहिए. और मुसलमानों को यह बात समझाने के लिए गांधीजी ने गोरक्षा की मिसाल भी दी. यह उस फरिश्ते की ही सिफत थी कि उसने खिलाफत और गोरक्षा को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया.

जरा भाषण के इस अंश पर गौर करें, ‘‘हजारों मुसलमान मुझसे कहते हैं कि अगर हिंदू-मुसलमान का सवाल पक्के तौर पर सुलझाया जाना है, तो इसे मेरे जीते जी सुलझा लिया जाना चाहिए. वैसे तो मुझे इस बात पर खुश होना चाहिए, लेकिन मैं ऐसी तजवीज को कैसे मानलूं जिसकी कोई तुक मेरी समझ में नहीं आती? हिंदू-मुस्लिम एकता कोई नई चीज नहीं है. करोड़ों हिंदू-मुसलमान यही चाहते हैं. मैं तो बचपन से ही सोच-विचारकर इस काम में लगा हूं. जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब मैंने इस बात की खास कोशिश की कि मुसलमान और पारसियों से मेरी दोस्ती हो. मुझे उस छोटी उम्र में भी भरोसा था कि अगर भारत के हिंदू अन्य समुदायों के साथ शांति से रहना चाहते हैं तो उन्हें भाईचारे की भावना पैदा करनी होगी... दक्षिण अफ्रीका में भी मैंने मुसलमान और पारसी दोस्त बनाए. और आखिर में जब भारत लौटा तो वे मेरे जाने से दुखी थे, उनकी आंखों में आंसू थे.

भारत में भी मैंने यही एकता हासिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एकता मेरी जिंदगी भर की अभिलाषा थी और इसी ने मुझे खिलाफत आंदोलन में मुसलमानों का साथ देने को प्रेरित किया. मुसलमानों ने पूरे देश में मुझे अपना सच्चा दोस्त माना.

तो फिर आज ऐसा क्या हो गया कि आज मैं (मुसलमानों के लिए) शैतान और अरुचिकर हो गया. क्या खिलाफत आंदोलन की हिंदू-मुस्लिम एकता मैंने किसी फरसे के जोर पर हासिल की थी. सच्चाई यह है कि मेरा अंतरयामी कहता था कि ऐसा करने से में गोरक्षा भी कर सकूंगा. मैं गो-पूजक हूं. मैं यह मानता हूं कि मैं और गाय एक ही ईश्वर की संतान हैं. गाय के प्राणों की रक्षा के लिए मैं अपने प्राणा न्योछावार करने को तैयार हूं. मेरा जीवन दर्शन और मेरी परम आशाएं कुछ भी हो सकती हैं, लेकिन खिलाफत आंदोलन से मैं किसी मोल-भाव की मंशा से नहीं जुड़ा था. खिलाफत आंदोलन से मैं इसलिए जुड़ा ताकि संकट की घड़ी में मैं अपने पड़ोसी के साथ खड़ा हो सकूं. अगर आज अली बंधु जीवित होते तो वे मेरी बात की सच्चाई के सबूत देते. और बहुत से लोग यह भी बताते की मैंने यह काम गाय का जीवन बचाने के लिए मोलभाव के तौर पर नहीं किया था. गाय और खिलाफत दोनों का महत्व उनके अपने गुणों के आधार पर है. एक ईमानदार आदमी, सच्चे पड़ोसी और वफादार दोस्त के नाते यह लाजिम था कि गाढ़े वक्त में मैं मुसलमानों के साथ खड़ा होऊं.’’

इस भाषण में आगे मोहम्मद अली जिन्ना के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग किया गया और दलित हितों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दुहराई गई. वैसे गाय को लेकर गांधी जी के ये विचार इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें और साफ करने की कोई जरूरत नहीं है, फिर भी इतना कह लूं तो बहुत ज्यादा बेअदबी नहीं होगी कि बापू यही समझा रहे थे कि अगर वह मुसलमानों को अपना दोस्त बना लेंगे, उनका दिल जीत लेंगे और उनके गाढ़े वक्त में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाएंगे तो आखिर को मुसलमान भी गोसेवा में उनके साथ आ जाएंगे. हां, यह भी याद रखिए कि गांधी गाय की रक्षा के लिए जान दांव पर लगाने की बात कह रहे थे, किसी की जान लेने की नहीं.

भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ पर बापू का यह सबक याद रखने में कुछ हर्ज है क्या?

Friday, 12 February 2016

नाम बड़े और दर्शन खोटे

300 मिलियन डॉलर का टर्नओवर करते चिरीपाल ग्रूप का शैक्षणिक घोटाला, एसबीएस मे फर्जीवाडा 





चिरीपाल ग्रूप द्वारा संचालित शांति बिजिनेस स्कूल(एसबीएस) मे दिया जाता बैचलर ऑफ कॉमर्स(बीबीए) की  यूजीसी द्वारा मान्य नही है. अहमदाबाद के टॉप बिजिनेस स्कूल मे शामिल एसबीएस, डाइरेक्टर अरबिंद सिन्हा के मुताबिक, छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर की डा. सी.वी. रमन यूनिवर्सिटी से संग्लन है. डा. सी.वी. रमन यूनिवर्सिटी एक निजी संस्था है. यूजीसी के अनुसार  यूनिवर्सिटी के पास संलग्नता देने का अधिकार ही नही है. ऐसे मे एसबीएस द्वारा किया गया बीबीए सिर्फ एक टाइमपास है.

क्या है मामला
शहर के नामी इन्डीस्ट्रियालिस्ट वेदप्रकाश चिरीपाल के द्वारा संचालित एसबीएस को गुजरात के टॉप बिजिनेस स्कूल में एक माना जाता है. 3.45 लाख फीस और फाइव स्टार सुविधाओं से लैस इस स्कूल को 2010 मे चिरीपाल ग्रूप द्वारा शुरु किया गया. इस कॉलेज मे डिग्री और डिप्लोमा दो तरह के कोर्स पढ़ाये जाते है. डिग्री कोर्स मे बीबीए कराया जाता है वही पोस्ट ग्रेजुएट मे डिप्लोमा कराया जाता है. इसमे  बीबीए फर्जी है.

कैसे फर्जी है बीबीए कोर्स?
डिप्लोमा के लिये मान्यता नही चाहिये लेकिन डिग्री के लिये किसी भी कॉलेज को यूजीसी से मान्यता प्राप्त करना होता है अथवा यूजीसी अधिकारिक यूनिवर्सिटी से संलग्नता लेना पड़ता है. फिर वही यूनिवर्सिटी संलग्न कॉलेज के समस्त छात्रों को डिग्री प्रदान करती है. लेकिन कहे अनुसार बीबीए की डिग्री देने के लिये एसबीएस जिस डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी छत्तीसगढ़ से संलग्न है वह किसी भी ऑफ सेंटर(राज्य से बाहर) संस्था को संलग्नता देने की अधिकारिक नही है.

डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी कैसे अधिकारिक नही है?
यूजीसी के अनुसार निजी यूनिवर्सिटी किसी भी संस्था, कॉलेज को संलग्नता नही दे सकती. वे अपने राज्य के बाहर कोई सेंटर्स नही शुरु कर सकती. यदि उनको राज्य के बाहर सेंटर्स शुरु करना है तो पहले अपने राज्य में पांच साल पूरा करें. पांच साल पूरा हो जाने पर यूजीसी को अन्य राज्य में सेंटर्स शुरु करने के लिये सूचित करें. फिर यूजीसी से अनुमोदन मिलने के बाद अन्य राज्य मे अपना सेंटर्स शुरु कर सकते हैं. लेकिन अभी तक यूजीसी ने किसी भी निजी यूनिवर्सिटी को अन्य राज्य में सेंटर्स शुरु करने का अनुमोदन नहीं दिया है.
यूजीसी द्वारा एक सार्वजनिक सूचना भी निजी यूनिवर्सिटीस को दिया गया है. जिसमें यूजीसी ने कहा है,"ऐसा जानने को मिला है कि कुछ निजी यूनिवर्सिटीस कॉलेज को मान्यता दे कर ऑफ सेंटर्स शुरु कर रहें हैं. यह यूजीसी के अधिनियम(एस्टॅब्लिशमेंट ऑफ एंड मेंटेनेन्स ऑफ स्टॅंडर्ड्स इन प्राइवेट यूनिवर्सिटीस) 2003 का उल्लंघन और प्रो. यश पाल एवम् अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवम् अन्य के मामले मे माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले का उल्लंघन है.
इस सार्वजनिक सूचना के साथ यूजीसी ने 234 यूनिवर्सिटीस का नाम भी दिया है जो किसी भी कॉलेज-ऑफ सेंटर्स को संलग्नता नहीं प्रदान कर सकती. इसमें डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी का नाम भी आता है.

क्या कह रहे एसबीएस डाइरेक्टर?
डाइरेक्टर अरबिंद सिन्हा के साथ जब इस बारे में फोन काल किया गया तो उन्होने कहा, "हमारी संलग्नता के साथ है लेकिन इस बारे में मुझे और अधिक जानकारी नही है." वहीं इस बारे में अधिक जानकारी के लिये हयर एज्युकेशन कमिश्नर ए. जे. शाह से संपर्क स्थापित करने की कोशिश नाकामयाब रही.

क्या कह रहे डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी के कुलसचिव?
संदेश डॉट काम ने जब इस बारे मे डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी, छत्तीसगढ़  के कुलसचिव शैलेश पाण्डेय से बात की तो उन्होने इस प्रकार के किसी भी संलग्नता से इंकार किया. बकौल कुलसचिव," हमारा छत्तीसगढ़ के बाहर कोई सेंटर नही है. अगर ऐसा कुछ कोई बोल रहा तो वह फर्जी है."


क्या हो सकता है?
यूजीसी द्वारा जारी उपरोक्त नियमानों के अनुसार डा. सी. वी. रमन यूनिवर्सिटी से संलग्नता एवम् एसबीएस से बीबीए सिर्फ एक शैक्षणिक घपलेबाजी बन के रह जाता है. उसपर यूनिवर्सिटी के कुलसचिव के बयान ने बाकी बचे, एसबीएस के बचाव के मौके पर भी गतिरोध लगा दिया है. अब यूजीसी या तो अपने नियमन मे बदलाव लाये या फिर एसबीएस से बीबीए कर रहे बच्चों की डिग्री सिर्फ एक रद्दी कागज रह जायेगी.

क्या होना चाहिये?
यूजीसी को इस मामले पर संज्ञान लेना चाहिये. इस पर एक कमिटी गठित कर के दोषिए तुरंत इस पर कार्रवाई करनी चाहिये. वही जो 100 के आस-पास बच्चे यहाँ से पढ रहे हैं, कुछ फाइनल ईयर मे है, उनके लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था करना चाहिये! क्योंकि संस्थाओं का दोष हो सकता है इसमें लेकिन बच्चों को का तो नहीं है. जिन्होने लाखो रुपये खर्च करके यहाँ से पढ़ाई की है सबका भविष्य लाखो खर्च करने के बाद अंधेरे मे है.

Published: http://www.sandesh.com/article.aspx?newsid=3229930

Tuesday, 2 February 2016

‘‘नाकामी का जीता-जागता स्मारक" पर क्यों बज रही ताली: मनरेगा


10 साल मनरेगा के
आज महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के 10 साल पूरे हो रहे गए। पहले ‘मनरेगा’ के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने वाली मोदी सरकार ने मंगलवार को इस योजना की तारीफ करते हुए कहा कि एक दशक की इसकी उपलब्धि राष्ट्रीय गर्व और उत्सव का विषय है।

यह योजना 2 फ़रवरी 2006 को 200 जिलों में शुरू की गई, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में विस्तारित किया गया और 1 अप्रैल 2008 तक अंततः भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। 2006-2007 में परिव्यय 110 बीलियन रुपए था, जो 2009-2010 में तेज़ी से बढ़ते हुए 391 बीलियन (पिछले 2008-2009 बजट की तुलना में राशि में 140% वृद्धि) रूपए हो गया। इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद से इस पर 313844 करोड़ रूपये खर्च हुआ जिसमें से 71 प्रतिशत मजदूरी का भुगतान करने में किया गया। इसके तहत 20 प्रतिशत कार्य अनुसूचित जाति वर्ग के मजदूरों और 17 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वर्ग के मजदूरों को प्रदान किया गया ।  2008-09 के दौरान 4,49,40,870 ग्रामीण परिवारों को मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराया गया


महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जिसे 25 अगस्त 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया गया।  बेल्जियम में जन्मे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में कार्यरत् अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की इस परियोजना के पीछे एक अहम भूमिका है। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है जो प्रतिदिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से पिछली यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ की तारीफ करने पर कांग्रेस ने कहा कि  देर आए दुरूस्त आए। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार ‘मनरेगा’ का मखौल उड़ाते हुए कहा था कि यह पिछले 60 सालों में गरीबी नहीं मिटा पाई कांग्रेस की ‘‘नाकामी का जीता-जागता स्मारक है।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भाजपा और मोदी सरकार के बदलते रवैया पर कहा कि देर आए दुरूस्त आए । अगर कोई कुछ अच्छी बात कहता है तो इसकी तारीफ करने की जरूरत है। यह दिखाता है कि इस अहम कानून से कैसे ग्रामीण गरीबों की जिंदगी में बदलाव लाने का काम किया।


अब मेरी बात-
मोदी ने एक समय इसी योजना को कांग्रेस के नाकामयाबी का स्मारक बताय था. आज वे ही इसकी तारीफ कर रहे. क्यों कर रहे तारीफ साहब? क्या इस देश के लोगो का पेट डिजिटल इंडिया से नहीं भरा जो आपको भी अब मनरेगा रास आने लगा है? या फिर जो आपने सपनों के हवाई किले खड़े किये थे वे ढहते महसूस हो रहे, जो अब मनरेगा भाने लगा है. साहब जुबान चलाना आसान है भूखी जनता के पेट की रोटी चलाना बहुत मुश्किल. मैं जनता हूँ साहब आप गलत नहीं हो, आप इस देश को सवांरने के लिए अपना जी जान दे रहे हो लेकिन साहब कल वालों ने उतने भी पाप नहीं किये थे, जो आपने उन्हें कंस बना दिया.

मुझे नहीं चाहिए मनरेगा साहब. आई लव डिजिटल इंडिया, आई लव आईफोन, आई लव मैक, आई लव शॉप ओन डिजिटल प्लेटफार्म फ्रॉम माय इतालियन फर्निश बैडरूम, बट बिफोर आल ऑफ़ इट, आई नीड ब्रेड! 80% से ज्यादा देश बेरोजगार अथवा जरुरत से काम आय से पीड़ित है, उसे रोटी चाहिए. पहले उसको दो जून की रोटी चाहिए फिर बुलेट ट्रैन और आईफोन .

नोट- कांग्रेस में तुम्हें सबसे नकारी और आलसी सरकार मानता हूँ.

किसान को सिर्फ सब्सिडी की बैसाखी नहीं , सरकार के सक्रिय समर्थन की जरूरत है.





पिछले अनेक वर्षों से महाराष्ट्र में विदर्भ ही नहीं, देश के कई अन्य भागों में फसल खराब होने के कारण कर्ज चुकाने में अक्षम किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं करते आ रहे हैं. केन्द्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012, 2013 एवं 2014 में कृषि से जुड़े कारणों ने 3313 किसानों को आत्महत्या करने पर विवश किया. इनमें से 3301 आत्महत्याएं केवल पांच राज्यों, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में हुईं. 1999 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और 2010 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने किसानों को सुरक्षा देने की दृष्टि से फसल बीमा योजना लागू की थी लेकिन अब नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है. इससे निश्चय ही किसानों को खराब फसल होने की स्थिति में काफी राहत मिलेगी.

योजना में यह प्रावधान है कि किसान अपनी फसल का जितनी रकम का बीमा करा रहा है, उसके लिए दिये जाने वाले प्रीमियम का रबी की फसल के लिए सिर्फ 1.5 प्रतिशत और खरीफ की फसल के लिए केवल दो प्रतिशत प्रीमियम ही देगा. शेष प्रीमियम सरकार अदा करेगी. लेकिन फसल खराब होने की स्थिति में उसे बीमे की पूरी रकम क्लेम में मिल सकेगी. सरकार को आशा है कि लगभग 50 प्रतिशत किसान इस योजना का लाभ उठा पाएंगे. अनुमान है कि प्रतिवर्ष इस पर सरकारी कोष से साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये दिए जाएंगे.
यह योजना ऐसे समय में आई है जब लोग यह जान कर चौंक पड़े हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने उद्योगपतियों का एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज माफ कर दिया है. ऐसे में यदि किसान छोटी-छोटी रकम के लिए आत्महत्याएं कर रहे हैं तो इससे जनता में आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है. इस स्थिति को टालने के लिए मोदी सरकार ने फसल बीमा योजना घोषित की है. निकट भविष्य में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. जाहिर है कि योजना की घोषणा उन्हें ध्यान में रखकर की गई है. लेकिन लोकतंत्र में ऐसा होना स्वाभाविक है और इससे योजना के लाभकारी चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. उम्मीद यही है कि, जैसा कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है, इस योजना से किसानों को एक सुरक्षा कवच मिलेगा.



लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कृषि क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है क्योंकि कृषि करना अब लाभ का काम नहीं रह गया है. पिछली सभी सरकारों ने और वर्तमान सरकार ने भी कृषि क्षेत्र में निवेश करने से गुरेज किया है और अपना पूरा ध्यान उद्योग को समर्थन देने पर केन्द्रित किया है. इसलिए अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व और भूमिका भी घटते गए हैं और अनेक कृषि उत्पादों के लिए हमारी आयात पर निर्भरता बढ़ती गई है. यदि वर्तमान केंद्र सरकार इस ओर भी ध्यान दे और इस असंतुलन को ठीक करे, तो वह कृषि के लिए दूरगामी महत्व का कदम होगा. किसान को सिर्फ सब्सिडी की बैसाखी की जरूरत नहीं है, उसे अपना कृषिकर्म सुचारू रूप से कर पाने के लिए सरकार के सक्रिय समर्थन की जरूरत है.

Friday, 29 January 2016

कमजोर पड़े भारत में राष्ट्रीय मूल्य



 

 30 जनवरी महात्मा गांधी की शहादत का दिन है. 68 वर्ष पहले इसी दिन नाथूराम गोडसे ने नयी दिल्ली के बिड़ला भवन में सांध्यकालीन प्रार्थनासभा में निहत्थे और कृशकाय 78-वर्षीय महात्मा गांधी के बिलकुल नजदीक जाकर पहले उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और फिर तुरंत अपनी पिस्तौल से उनके शरीर में तीन गोलियां उतार दीं. महात्मा गांधी के मुंह से ‘हे राम' निकला और उन्होंने प्राण त्याग दिए. तभी से इस दिन को पूरे देश में ‘शहीद दिवस' के रूप में मनाया जाता है और महात्मा गांधी के साथ देश के लिए अपनी जान निछावर करने वाले अन्य शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है.

लेकिन सभी भारतवासी श्रद्धांजलि देने में शामिल नहीं होते. भारत को हिन्दू राष्ट्र मानने वालों का आदर्श सर्व-धर्म-समभाव वाले धर्मनिरपेक्ष महात्मा गांधी नहीं बल्कि मुस्लिम-द्वेष पर आधारित राष्ट्रीयता के सिद्धान्त में गहरी आस्था रखने वाला हिंदुत्ववादी गोडसे है. आजादी के बाद कई दशकों तक ये गोडसे-भक्त निष्क्रिय रहे क्योंकि माहौल उनके अनुकूल नहीं था, लेकिन पिछले तीन-चार दशकों के दौरान जैसे-जैसे हिंदुत्ववादी राजनीति ताकतवर होती गयी वैसे-वैसे ही इनके हौसले भी बढ़ते गए. पिछले कुछ वर्षों से तो खुलकर गोडसे का महिमामंडन किया जाने लगा है. यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि नाथूराम गोडसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य था. फिर वह विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से आकृष्ट होकर हिन्दू महासभा में शामिल हो गया.
यूं भी संघ और हिन्दू महासभा की विचारधारा एक-जैसी ही थी. जब उस पर महात्मा गांधी की हत्या का मुकदमा चला तो उसने संघ के साथ अपने संबंधों को छुपाए रखा जिसके कारण तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने संघ को प्रतिबंधित करने के कुछ समय बाद कुछ शर्तों के आधार पर प्रतिबंध हटा दिया. लेकिन सरदार पटेल का स्पष्ट मत था कि संघ ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया और उसके कार्यकर्ताओं ने हत्या की खबर मिलते ही जगह-जगह खुशियां मनाई और मिठाइयां बांटीं.

 हिन्दुत्व की अवधारणा हिन्दू महासभा के शीर्षस्थ नेता विनायक दामोदर सावरकर ने दी थी और गोडसे पर चले मुकदमे में वह भी एक सह-अभियुक्त थे. उन्हें केवल इस तकनीकी आधार पर बरी किया गया क्योंकि सरकारी गवाह के बयान की किसी दूसरे गवाह द्वारा पुष्टि नहीं हो पायी थी. लेकिन बाद में सामने आए तथ्यों से स्पष्ट हो गया कि गांधी हत्याकांड की साजिश रचने और गोडसे को इसके लिए प्रेरित करने में उनकी सबसे बड़ी भूमिका थी.

इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पिछले वर्ष हिन्दू महासभा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में 30 जनवरी के दिन नाथूराम गोडसे की मूर्ति लगाने की घोषणा की थी. यह संगठन 30 जनवरी को शौर्य दिवस के रूप में मनाता है, उसी तरह जैसे विश्व हिन्दू परिषद 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहाने के कारण शौर्य दिवस के रूप में मनाता है. इस वर्ष हिन्दू महासभा ने 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस के बजाय ‘काला दिवस' मनाया और घोषणा की कि उसका लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने का है.

इस पृष्ठभूमि को देखते हुए यह कतई आश्चर्यजनक नहीं है कि गोवा के रवीन्द्र भवन में, जो एक सरकारी संस्था है और जिसके अध्यक्ष भाजपा के नेता दामोदर नायक हैं, 30 जनवरी को अनूप अशोक सरदेसाई द्वारा नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी की हत्या के बारे में लिखी पुस्तक का लोकार्पण समारोह आयोजित हो रहा है और इस समारोह के अध्यक्ष भी दामोदर नायक हैं. यह आयोजन इस सचाई को दर्शाता है कि आजादी के लिए चले राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान उत्पन्न मूल्य कितने कमजोर पड़ गए हैं और इस आंदोलन से अलग-थलग रहने वाली सांप्रदायिक राजनीतिक शक्तियां कितनी मजबूत हो गयी हैं.

Source:DW

Tuesday, 19 January 2016

अंधेर नगरी चौपट राजा को चरितार्थ करती सरदार पटेल युनिवर्सिटी


मैं चोर, मैं सिपाही! है दम तो रोको मेरी मनमानी,एडवांस कोर्स के नाम पर शिक्षण को गर्त ले जाती सरदार पटेल युनिवर्सिटी, एडमिशन के लिए बच्चों को सपने बेचने से ले कर, डिग्री तक बेंचते हैं अध्यापक  





सरदार पटेल के सहयोगी भाईकाका द्वारा सरदार पटेल के सहयोग से प्रस्थापित सरदार पटेल युनिवर्सिटी (राज्य युनिवर्सिटी) पर बाजारीकरण का ऐसा हवा चढ़ा है की सारे मूल्यों को दरकिनार कर बस शिक्षा बेचने पर जुटी है. हालत ऐसे है कि युनिवर्सिटी से सम्बद्ध जो स्व-वित्तपोषित कॉलेज के अध्यापक किसी मार्केटिंग एक्सपर्ट की तरह घर-घर जा कर विद्यार्थियों को एडमिशन लेने के लिए प्रेरित करते हैं, तरह-तरह के सब्जबाग दिखाते है, वही पढ़ाते हैं, इंटरनल एग्जाम लेते हैं, वहां तक तो बात समझ में आती हैं. लेकिन झटका तब लगता हैं जब वे एक्सटर्नल के लिए पेपर सेट करते हैं, एक्सटर्नल एग्जाम लेते हैं, और फिर वे ही पेपर चेक कर के नंबर भी दे देते हैं. सबकुछ शिक्षा को बाजार बना दिए शिक्षकों के हाथ में हैं. हालत ऐसे बन चुके हैं कि कोई भी एडवांस कोर्स का बच्चा फर्स्ट क्लास से नीचे तो रुकता ही नहीं. अध्यापको से यदि आपके रिलेशन अच्छे है तो डिस्टिंक्शन तो बहुत मामूली बात हो गयी. जब सौ प्रतिशत रिजल्ट और अस्सी प्रतिशत से ज्यादा बच्चों को डिस्टिंक्शन देने का दावा करने वाले कालेजों का जाँच की तो नतीजे आँख खोलने वाले उभर के आये.
सम्पूर्ण गुजरात में अपने शिक्षण के लिए मशहूर वल्लभ विद्यानगर-आनंद शैक्षणिक व्यवसाय का नया केंद्र बन चुका हैं. 3 मार्च 1946 में सरदार पटेल के सहयोगी भाईकाका ने, सरदार के आशीर्वाद से वल्लभ विद्यानगर की स्थापना शैक्षणिक नगरी के रूप में की. इस नगर को बसाने का उद्देश्य देश के अंदर उच्य गुणवक्तायुक्त शिक्षा अपने घर-आँगन में प्रदान करना था. भाईकाका सरदार के साथ अहमदाबाद मनपा में चीफ इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे. वहाँ से 1942 में पदत्याग के बाद वे यहाँ आये और चरुत्तर एजुकेशन सोसाइटी के चेयरमैन का पद ग्रहण किया, फिर विद्यानगर की स्थापना और फिर चेरिटेबल ट्रस्ट चरुत्तर विद्या मंडल की स्थापना हुई. सरदार के मृत्यु के बाद 1955 में सरदार पटेल युनिवर्सिटी की स्थापना हुई. बीसवीं सदी के अंत तक शिक्षा के क्षेत्र में युनिवर्सिटी ने अपना अलग मुकाम बना लिया. सिर्फ चरुत्तर अथवा गुजरात ही नहीं वरन राजस्थान और महाराष्ट्र के दूर-दराज इलाकों से भी विद्यार्थियों की पूरी खेप आने लगी. लेकिन फिर स्व-वित्तपोषित कॉलेज, सौ प्रतिशत रिजल्ट और एडवांस कोर्स का ऐसा दौर शुरू हुआ जिसने शिक्षा चाल-चरित्र को ही बदल के रख दिया.


एडवांस कोर्स क्या है?
युनिवर्सिटी से जुड़े ज्यादातर कॉलेज अपने यहाँ एक नए एडवांस कोर्स के नाम पर नया प्रोडेक्ट बाजार में बेचने के लिए उतार देते है”,  जैसे- बीए एडवांस इन पोलिटिकल साइंस, हिस्ट्री, लैंग्वेज एंड लिटरेचर, जर्नलिस्म आदि. फिर शुरू होता है उनको बेचने का का कवायद. बड़े-बड़े बैनर छापना, बच्चों को नाना प्रकार के सब्जबाग दिखाना और फिर उनसे मोटी रकम ऐंठ लेना. एडवांस कोर्स में वे कुछ भी एडवांस नहीं देते बस सेलेबस को थोड़ा-सा इधर-उधर करना और फिर उसको युनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त कर लेना. युनिवर्सिटी सिंडिकेट बिना उनसे किसी सवाल-जवाब के मान्यता प्रदान भी कर देती है क्योकिं चोर-चोर मौसेरे भाई. सिंडिकेट से जुड़ा हर एक मेंबर किसी किसी तरह से अन्य किसी शैक्षणिक संस्था जुड़ा होता है. तो मान्यता प्राप्ति के वक्त बस "तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजाता हूँ" के फलसफा से काम हो जाता है. उनसे एक भी बार नहीं पूछा जाता कि इस एडवांस कोर्स के लिए आपके पास एडवांस व्यवस्था क्या-क्या है? एडवांस आइडिया और एडवांस टेक्नोलॉजी क्या है? और इस तरह बिना किसी एडवांसनेस के एडवांस कोर्स शुरू हो जाता है. हालत यह की ज्यादातर कालेज बेसिक प्रैक्टिकल लैब से भी महरूम है लेकिन कोर्स एडवांस चला रहे हैं.

एडवांस कोर्स की जरुरत क्या है?
इसकी कहानी सबसे दिलचस्प है. नाम ना देने के शर्त पर युनिवर्सिटी के ही एक प्रोफ़ेसर बताते हैं कि "दरसल एडवांस कोर्स की शुरुवात किसी एक्का-दुक्का स्व-वित्तपोषित कालेज से शुरू होती है. इसलिए उन विषय के अध्यापक भी बस उन्हीं संस्थाओं के पास होते हैं. ऐसे में वही अध्यापक एडमिशन लेते हैं, वही पढ़ाते हैं, वही पेपर भी सेट करते हैं और पेपर चेक कर के नंबर भी दे देते हैं. इस तरह नंबरों की बरसात भी हो जाती है और सौ प्रतिशत रिजल्ट बन जाता है. कोई भी बच्चा फेल नहीं होता. बच्चा भी खुश, माता-पिता भी खुश और और मोटी कमाई करने वाले कालेज भी खुश."
इससे हुए नुकसान की जानकारी जब बच्चे को मालूम पड़ती तो तबतक उसके पैरों के नीचे से जमीं खिसक चुकी होती है. वह कहीं का नहीं बचा होता है. बड़ी डिग्री के साथ ना वह छोटा काम कर सकता है और ना डिग्री के अनुसार उसमे दक्ष-कुशलता होती है जिससे वह कुछ कर सके. अंततः या तो वह जिंदगी से हार मान कर बैठ जाता है और वह काम करने लगता है जो अनपढ़ या बिना डिग्री वाले का है अथवा किसी तरह से वीजा के जुगाड़ में लग जाता है ताकि वह किसी तरह विदेश भाग सके और अपनी डूबती नैया को संभाले. ज्ञात रहे चरुत्तर विदेश जाने का गुजरात में मुख्य केंद्र हैं. पटेल  को शायद अमेरिकन वीजा ना देने में जो सख्ती वरती जाती हैं उस पालिसी को लाने में सबसे बड़ा सहयोग चरुत्तर के पटेलों का ही हैं. हालत ऐसे है कि तमाम एडवांस ग्रेजुएट बेरोजगार बैठे है अथवा, वह काम कर रहे जिसके लिए उनको उस डिग्री की आवश्यकता नहीं थी.

एडवांस कोर्स से युनिवर्सिटी को क्या फायदा हैं?
युनिवर्सिटी को भी इस एडवांस कोर्स से बढ़िया फायदा है. कुछ खास जिम्मेदारी उसके हिस्से नहीं बचती. कॉलेज को विषय का मान्यता देने के बाद बस उसका काम डिग्री छाप देना होता हैं. ऐसे में युनिवर्सिटी प्रबंधन कार्यभार से काफी हद तक मुक्त रहता हैं. मान्यता दे देने से कॉलेज और युनिवर्सिटी का भी सम्बन्ध मधुर बना रहता हैं क्योंकि युनिवर्सिटी प्रबंधन को काम नहीं करना पड़ता तो वही कॉलेजों को मनमानी करने की पूरी छूट मिली होती हैं.
इस एडवांस कोर्स के खेल में युनिवर्सिटी पूरी तरह से सेफजोने में चली जाती हैं. ऊपरी स्तर से जब कोई जाँच में दिक्कत पायी जाती हैं तो युनिवर्सिटी को बचने का बहाना होता हैं कि कोर्स एडवांस हैं इसलिए उसके लिए यह व्यवस्था नहीं हो पाया.
जैसे आज जब .. युनिवर्सिटी के एक हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट से पूछा कि बीए की कॉपी जाँच करने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए तो उन्होंने बताया कि, " तीन साल का बीए का टीचिंग एक्सपीरियंस लेकिन अगर योग्य लोग उपलब्ध ना हों तो  फ्रेश एमए डिग्री धारक व्यक्ति भी कर सकता हैं."
एडवांस कोर्स का यह एक और मुख्य फायदा हैं. रेगुलर कोर्स के पीएचडी धारक हर जगह मौजूद होते हैं, ऐसे में ऊपरी जाँच में यह बहाना नहीं दिया जा सकता कि योग्य व्यक्ति नहीं मिल रहे लेकिन एडवांस में यह सुविधा मिल जाती हैं. वे जाँच में बोल सकते हैं कि पीएचडी धारक नहीं मिल रहा सो एमए डिग्री वाले से काम चला रहे हैं. जबकी असली खेल यह होता हैं कि एमए डिग्री वाले पांच हजार से ले कर पच्चीस हजार तक में मिल जाते हैं जबकि पीएचडी वाले पंद्रह से ऊपर ही बात शुरू करते हैं. तो कॉलेजों में ह्यूमन रिसोर्स पर होने वाला एक बहुत बड़ा खर्च बच जाता हैं.
सब तरफ से एडवांस कोर्स सरदार पटेल युनिवर्सिटी और उनसे जुड़े कॉलेजों के लिए सोने की अंडा देने वाली मुर्गी हैं. जिसे युनि. और उसके कालेज युजीसी की आँखों में धुल झोंककर इस्तेमाल कर रहे. बच्चों को बड़े-बड़े ख्वाब दिखाना, उनके माँ-बाप को सपने बेचना और अपना उल्लू सीधा कर लेना.